नगर की डेढ़ किमी लंबी मुख्य बाजार पटाल बजार के नाम से जानी जाती है। यह बाजार शहर की पहचान से जुड़ा है। एक दशक पहले पालिका ने इन पटालों को हटाकर बाजार में कोटा स्टोन बिछा दिया। फिसलन के चलते राहगीरों के लिए मुसीबत बन गए कोटा स्टोन हटाकर फिर से स्थानीय पटालें बिछाने की मांग लंबे समय से जोर पकड़ रही है।
मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अल्मोड़ा बाजार की खास पहचान रही स्थानीय पटाल लगवाने की घोषणा की थी पर काफी प्रयासों के बाद स्थानीय पटालें ही नहीं मिल पा रही हैं। अल्मोड़ा समेत पर्वतीय क्षेत्रों की भवन निर्माण शैली में स्थानीय खानों से निकाली जाने वाली स्लेटों (पटालों) का खास महत्व है।
पहाड़ों में घरों की छतों को पटाल से ढका जाता है। पटाल लगे घर सर्दियों और गर्मियों में अधिक ठंडे और गरम नहीं होते हैं। घर के आंगन और रास्तों में भी पटालें बिछाने की परंपरा रही है। अल्मोड़ा नगर बसने के समय से ही एलआर साह मार्ग से पल्टन बाजार स्थित एलेक्जेंडर गेट तक डेढ़ किमी लंबे बाजार मार्ग में पत्थर की पटालें बिछाई गई थीं।
इसे पटाल बाजार के नाम से ही जाना जाता है। इस बाजार में वाहन नहीं चलते हैं। पटालें एक प्रकार से नगर की पहचान से भी जुड़ी हैं। अधिकांश स्थानों पर पटालें टूट जाने से पालिका ने 2003 में इन्हें हटाकर कोटा स्टोन बिछा दिया।
फिसलन भरे कोटा स्टोन में गिर कर राहगीरों के घायल होने से इसे हटाकर पत्थर की पटाल लगाने की मांग जोर पकड़ने लगी। करीब एक साल पहले अल्मोड़ा में हुई कैबिनेट बैठक में बाजार में स्थानीय पटाल बिछाने का निर्णय लिया गया था। लंबा समय बीत जाने के बाद भी काम अधर में है।
पालिकाध्यक्ष प्रकाश जोशी ने बताया कि नगर के आसपास और अन्य क्षेत्रों में पटाल निकालने को कोई खान मंजूर नहीं है। पालिका ने पूर्व में निविदा निकाली थी। किसी भी फर्म ने स्थानीय पत्थर की पटालों की सप्लाई को रुचि नहीं दिखाई। प्रयास जारी हैं। स्थानीय पटाल उपलब्ध होते ही काम शुरू होगा।