पहाड़ में आई जलप्रलय के कई पहलू सामने आ रहे हैं। केदारघाटी में हुई तबाही के सैटेलाइट चित्रों को उजागर करने वाले उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) ने एक बार फिर तबाही के दूसरे पहलू का अध्ययन शुरू किया है। मंदाकिनी वैली में जगह-जगह एक हजार लैंडस्लाइड सामने आए हैं।
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यूसैक के निदेशक डा. एमएम किमोठी ने बताया कि सभी घाटियों में भूस्खलन के अध्ययन के लिए नेशनल रिमोट सेंसिंग केंद्र हैदराबाद की मदद ली जा रही है। अभी तक मंदाकिनी वैली की 2.5 मीटर रिजॉल्यूशन(2.5 मीटर तक की) मैपिंग में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं।
15 जून से अब तक पूरी मंदाकिनी वैली में एक हजार जगहों पर भूस्खलन पाया गया है। इसमें कई लैंडस्लाइड तो ऐसे हैं, जो कि लंबे समय से मृत थे। इस आपदा में वह भी एक्टिव हो गए। वैली से जुड़े गांवों में सड़क से लेकर घरों की तबाही का मंजर भी काफी चौंकाने वाला है। कई जगहों पर तो सड़क नजर ही नहीं आ रही है।
डा. किमोठी के मुताबिक इसी प्रकार दूसरी घाटियों का सर्वेक्षण भी किया जा रहा है। जिसकी रिपोर्ट जल्द ही सामने आ जाएगी।
विदेशी नहीं देसी सैटेलाइट है कामयाब
यूसैक और इसरो के उत्तराखंड से जुड़े सभी सैटेलाइट अध्ययन में एक और खास बात यह है कि विदेशी सैटेलाइट यहां कामयाब नहीं है। नासा के सैटेलाइट से चित्र लेने पर 15 मीटर ऊपर से ही मैपिंग हो सकती है लेकिन भारत के सैटेलाइट कार्टो सेट 1 और लिस 4 से प्रदेश की तबाही की हकीकत आसानी से सामने आ जाती है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक भारतीय सैटेलाइट 2.5 मीटर तक की मैपिंग करने में कामयाब है।
चौराबाड़ी से निकलती है मंदाकिनी
मंदाकिनी अलकनंदा की सहायक नदी है। इसका उद्गम स्थान केदारनाथ के निकट है। मंदाकिनी का स्रोत केदारनाथ के निकट चौराबाड़ी ग्लेशियर है। यह वही ग्लेशियर है, जिससे आए मलबे और पानी की वजह से केदारघाटी में तबाही हुई है। सोनप्रयाग में यह नदी वासुकी गंगा नदी द्वारा पोषित होती है।
रुद्रप्रयाग में आकर मंदाकिनी नदी अलकनंदा में मिल जाती है। उसके बाद अलकनंदा बहती हुई देवप्रयाग की ओर बढ़ती है, जहां वह भागीरथी नदी से मिलकर गंगा नदी का निर्माण करती है।
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