सत्तारूढ़ दल सपा के कार्यकर्ता परेशान हैं कि अफसर उनकी सुन नहीं रहे। नेता शिकायत कर रहे हैं कि अधिकारी तो उनकी भी नहीं सुन रहे हैं। इनका यह दर्द भी मुखर हो रहा है कि जनता नाराज हो रही है, लोकसभा चुनाव में इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को कहना पड़ रहा है कि दस महीने का मौका देने के बावजूद अफसर सुधर नहीं रहे, इसलिए ओवरहालिंग करनी पड़ेगी।
मो. आजम खां को धमकाना पड़ रहा है, ‘अधिकारी डंडे की भाषा समझते हैं। यह चाबुक चलने पर काम करते हैं।’ जनता चकित है कि अब वह कहां जाए। जो अधिकारी सरकार की नहीं सुन रहे, सत्तारूढ़ दल के नेताओं की नहीं सुन रहे तो उसकी क्या सुनेंगे। अधिकारी चुप्पी साधे हैं।
कार्यपालिका के शीर्ष पर बैठे आईएएस व आईपीएस संवर्ग की वर्तमान समिति के पदाधिकारी इस मामले पर कुछ बोलना नहीं चाहते। पीसीएस व पीपीएस एसोसिएशन कहती है इस चुप्पी ने पूरी स्थिति को रहस्यपूर्ण बना दिया है तो यह पहेली और गहरा गई है कि आखिर असली वजह क्या है।
खतरनाक है यह स्थिति
लोकप्रशासन के विशेषज्ञ प्रो. मनोज दीक्षित इस स्थिति को खतरनाक बताते हैं। वह सरदार बल्लभ भाई पटेल की बात का उल्लेख करते हैं, ‘नौकरशाही एक घोड़े की तरह है। कुशल सवार उसे अच्छे तरीके से हांक कर मंजिल पर पहुंच जाता है तो अकुशल सवार को घोड़ा ही बीच में गिरा देता है।’ वह कहते हैं कि डंडा और चाबुक की भाषा लोकतंत्र का हिस्सा नहीं है। नौकरशाही और सरकार चलाने वाले मंत्रियों व मुख्यमंत्री का रिश्ता भरोसे पर आधारित होता है। यह भरोसा टूटने से पूरी व्यवस्था को खतरा खड़ा हो जाता है।
उनका कहना है कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं को समझना होगा कि इस तरह की बात करके वह अपनी प्रशासनिक अक्षमता ही साबित कर रहे हैं। इनके मन में कहीं न कहीं सरकार के सहारे लोकसभा के अगले चुनाव में सफलता पाने की कुलबुलाहट हलचल मचाए है। यह समझ नहीं पा रहे हैं कि सरकार और संगठन तो अलग-अलग बाते हैं। दोनों के घालमेल से व्यवस्था बिगड़ती है और सत्तारूढ़ दल हड़बड़ी में खुद को कठघरे में खड़ा कर रहा है।
यह भूल रहे हैं कि यह कहकर कि अधिकारी उनकी भी नहीं सुन रहे हैं, वे जनता के बीच अपनी स्थिति को न सिर्फ कमजोर बल्कि हास्यास्पद बनाते जा रहे हैं। यह भूल रहे हैं कि चुनाव इन्हें लड़ना है नौकरशाही को नहीं, इसलिए सक्षम इन्हें ही होना पड़ेगा।
गलती किसकी है?
प्रदेश के सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी राकेश मित्तल और सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक के एल गुप्ता भी कहते हैं कि अधिकारी अगर मंत्रियों व सत्तारूढ़ दल की नहीं सुन रहे हैं तो गलती भी उन्हीं की है। जनता ने उनकी सरकार बनवा दी तो अब उन्हें किसने रोका है अधिकारियों से काम लेने से। जिस तरह की बातें की जा रही हैं वह जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने वाला रवैया है।
उन्होंने कहा कि अपनी असफलता का ठीकरा अधिकारियों के सिर फोड़कर खुद को पाकसाफ साबित करने की कोशिश की जा रही है। यह समझ नहीं रहे हैं कि इनकी बात कितनी खतरनाक है। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि जब अफसर इनकी नहीं सुन रहे तो उसकी क्या सुनेंगे। राज्य अपने आप में सर्वशक्तिशाली होती है। वह चाहे जैसे काम ले और चाहे जो दंड दे।
मौजूदा सरकार को कार्य करते दस महीने बीत चुके हैं। इतना समय किसी भी बात को साबित करने के लिए पर्याप्त होता है। इस दौरान कई बार पुलिस अफसरों के तबादलों की बड़ी-बड़ी लिस्टें निकल चुकी हैं। अन्य अधिकारियों को भी हटाया गया है। फिर भी डंडा चलाने और चाबुक से सुधारने की बात कही रही है। इससे तो यही साबित होता है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक नियंत्रण में कमी है। अगर हालात नहीं संभल रहे हैं तो इसकी जिम्मेदार भी सरकार ही है।
चुप्पी क्यों साधे है आईएएस व आईपीएस एसोसिएशन
भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष कर रहे अधिकारियों के संगठन ‘जिजीविषा’ के अध्यक्ष चंद्रभूषण पाण्डेय कहते हैं गलती दोनों ओर से लग रही है। पर, आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन की चुप्पी यह साबित करती है कि कहीं न कहीं उनके मन में चोर है। जिसके चलते वे बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। अगर मन में चोर नहीं होता तो इनके अंदर का स्वाभिमान जरूर ऐसी बातों पर इन्हें जुबान खोलने के लिए मजबूर कर देता।
सपा मुखिया मुलायम सिंह की यह बात सही लगती है कि अफसर सरकार की नीतियों को ठीक से लागू करने में आनाकानी कर रहे हैं। पर, किसी मंत्री की चाबुक व डंडा चलाने की भाषा ठीक नहीं है।
'गलती तो मंत्रियों व मुख्यमंत्री की है'
पूर्व पुलिस महानिदेशक के एल गुप्ता का कहना है कि सत्तारूढ़ दल के नेता कमजोरी को छिपाने के लिए खीझ में ऐसी बातें कर रहे हैं। सरकारी अफसर को वह काम करना ही होगा जो सरकार चाहेगी। इन बातों से फिलहाल यही साबित होता है कि सत्तारूढ़ दल सरकार चला नहीं पा रहा है। इसकी वजह चाहे जो हो।
अगर सत्तारूढ़ दल ईमानदारी से काम करेगा तो अधिकारियों की गड़बड़ करने की हिम्मत नहीं हो सकती। अगर स्थिति वही है जैसा सत्तारूढ़ दल के लोग कह रहे हैं तो उनकी अक्षमता है। अधिकारियों की कमान मुख्यमंत्री और मंत्रियों के हाथ होती है। फिर अफसरों को दोष व धमकी का क्या मलतब। यह तो अपनी कमी छिपाने के लिए खिसिया कर मातहतों पर दोष मढ़ने की बात हो गई।