मंजिलें उन्ही को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है ''
सिर्फ पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है !!
हौसलों से उड़ान कैसे भरी जाती है, ये सीखिए अरुण से। विकलांग होने के बावजूद ये किसी पर मोहताज नहीं हैं। यह बीए, एमए (इकोनॉमिक्स) और बीएड पास हैं। विकलांगता इनकी सफलता में बाधा नहीं है। इन्होंने अपने दो स्वस्थ हथियार {हाथ} के बिना, पैरों को हाथों में परिवर्तित कर दिया है।
मिलिए लालकृष्ण अरुण कुमार, से जो अपने दोनों हाथों खो चुके हैं। उनके माता पिता माधव राव और जयश्री दोनों निजी स्कूलों में काम करके उसे घोर गरीबी की वजह से कृत्रिम अंग प्रदान करने में असमर्थ थे। पढ़ाई में अपनी क्षमता साबित करने के लिए अरुण ने पैरों के साथ लिख कर अपनी शिक्षा जारी रखी। अब, पैरों की मदद से, वह अच्छी तरह से, अपने दैनिक कामकाज कर लेते है और यहां तक कि क्रिकेट, शतरंज, केरम खेल लेते हैं।
अरुण सरकारी प्राथमिक विद्यालय कट्टा करीम नगर , रामपुर, में विद्या स्वयंसेवक के रूप में काम करते हैं और ट्यूशन का आयोजन कर आजीविका चलाते हैं। यह केवल पैरों की मदद से ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं और अपने छात्रों से प्रशंसा जीतते हैं। अरुण अपने पैरों की मदद के साथ सेलुलर फोन का उपयोग करते है !
अरुण का कहना है कि उन्हें विकलांग होने पर कोई पछतावा नहीं है। वह एक विद्या स्वयंसेवक के रूप में सरकारी स्कूलों में गरीब छात्रों को पढ़ाने से बहुत खुश हैं।