वाराणसी। महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल के सातवें अध्याय का रंगारंग समापन रविवार को हुआ। अंतिम दिन भी गंगातट पर गंगा की लहरों के समानांतर सुर, लय व ताल की सुरगंगा प्रवाहमान रही। कबीर भजन संग बांसुरी के कर्णप्रिय स्वर गूंजे तो वहीं, इंडियन ओशन बैंड की धुन पर हर कोई थिरक उठा।
रविवार को गुलेरिया घाट पर फेस्टिवल के अंतिम दिन सुबह से रात तक संगीत की धारा प्रवाहमान रही। सुबह के सत्र में हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक पूर्णेश भागवत ने कबीर के भजनों से जीवन के रहस्य और हकीकत से रूबरू कराया। साथ ही मजहब के बंधन से मुक्त मानवता को श्रेष्ठ बताया। उन्होंने धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय..., चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए ..., साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय..., गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय... आदि भजनों को सुनाकर भावविभोर कर दिया। इसके बाद बांसुरी और वाद्ययंत्र की युगलबंदी बेजोड़ रही। कार्तिकेय और मकरंद ने वाद्ययंत्रों पर कबीर धुन सुनाकर सभी को मगन कर दिया। इस दौरान कबीर पर संवाद हुआ। पुरुषोत्तम अग्रवाल और सौम्या कुलश्रेष्ठ ने विचार रखे। कहा, कबीर समयातीत हैं। उनकी रचनाएं सभी धर्मों व पंथों में श्रेष्ठ है। शाम के सत्र में दिल्ली पब्लिक स्कूल वाराणसी के विद्यार्थियों ने शानदार प्रस्तुति दी। इसी कड़ी में राहुल राम और वासु दीक्षित की जोड़ी ने गीत-संगीत के साथ इंडियन ओशन बैंड की बेजोड़ प्रस्तुति से सभी को झूमा दिया। उन्होंने वाद्य यंत्रों से कबीर को साधा। संचालन सौम्या कुलश्रेष्ठ ने किया।