हनुमत्पीठ के पीठाधीश्वर मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज ने कहा कि पं. मदन मोहन मालवीय ने महामना शब्द को चरितार्थ किया। गीता प्रवृत्ति से निवृत्ति का विज्ञान है। गीता में कर्म एवं ज्ञान का सेतु भक्तियोग है। मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, क्योंकि उसका अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर नहीं। यही निष्काम कर्मयोग का मूल संदेश है। यानी की निस्वार्थ होकर कर्म करना ही श्रेष्ठता का मार्ग है।
वह सोमवार को बीएचयू मालवीय भवन में गीता समिति की ओर से मोक्षदा एकादशी पर गीता जयंती महोत्सव को संबोधित कर रहे थे। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि गीता का सिद्धांत है कि समस्त मानवमात्र में एक ही दिव्य आत्मा विद्यमान है, ऐसे भाव रखने से ही समानता, सम्मान और समावेशिता को बढ़ावा गीता द्वारा ध्यान और आत्म-नियंत्रण का उपदेश आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी है। संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि गीता हमें बुद्धिमता पूर्वक अपने कर्म में प्रवेश करना सिखाती है। कर्म का कुशलतापूर्वक संपादन करना सिखाती है। संचालन प्रो. शरदिंदु कुमार त्रिपाठी और स्वागत प्रो. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने किया।
ये रहे विजेता
इस अवसर पर आयोजित कनिष्ठ, मध्यम, कंठस्थ गीता पाठ प्रतियोगिता में प्रथम वसुधा भट्टराई, द्वितीय हार्दिक वैश्य, तृतीय श्रुति झा, प्रोत्साहन पुरस्कार आलोक तिवारी, सागर शुक्ल, सत्यभामा को दिया गया। मध्यम वर्ग में प्रथम दिपांशु मिश्र, द्वितीय प्रियांश पांडेय, तृतीय शिवम् व श्रेय वल्लभ रहे। प्रोत्साहन पुरस्कार अवनिदेव मिश्र, सुंदरम् कुमार मिश्रा, पर्णिका सिंह को मिला। वरिष्ठ वर्ग में प्रथम कात्यायनी मिश्रा, द्वितीय कृष्णा मिश्रा, तृतीय राजेश दूबे, निखिल पांडेय और प्रोत्साहन पुरस्कार शिवानंद खडूरी, दिव्यांश दूबे को मिला। इसी तरह गीता भाषण प्रतियोगिता में तनुजा शुक्ला, गौरव उपाध्याय, राजश्री ठाकुर, उज्जवल मिश्र, विजय पांडेय, लावण्या बिजलानी, स्वास्तिक त्रिपाठी, हर्षित श्रीवास्तव को पुरस्कृत किया गया।