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जंगमबाड़ी मठ क्यों गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी? जानिए वजह

Sun, 16 Feb 2020 07:29 PM IST
स्‍वाधीन तिवारी अजय राय, अमर उजाला, वाराणसी
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जंगमबाड़ी मठ में पीएम मोदी - फोटो : अमर उजाला।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को वाराणसी में वीर शैव महाकुंभ के समापन समारोह में भाग लिया। कार्यक्रम में भाग लेने के लिए उनके साथ कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा भी आए थे। आस्था के कुंभ में प्रधानमंत्री का शामिल होने का अर्थ दक्षिण भारत की राजनीति में दस्तक देना है, जहां भाजपा खुद को मजबूत करने में लगी है। कभी हरिकेश आनंदवन के नाम से मशहूर रहा स्थल आज वीर शैव मत का प्रमुख केंद्र है। इसे शिव को जानने वाला स्थान या जंगमबाड़ी मठ के नाम से जाना जाता है।

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हजारों शिवलिंगों वाले इस अनूठे आस्था के केंद्र की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब और मुहम्मद शाह ने इस मठ को भूमि आदि दान में दी थी। मठ में सारे दानपत्र सुरक्षित रखे हुए हैं। प्रधानमंत्री ने यहां वीर शैव मत के ग्रंथ सिद्धांत शिखामणि के हिंदी अनुवाद और ऐप का लोकार्पण किया। इस तरह उन्होंने दक्षिण को जोड़ने की कोशिश की। दरअसल, वीर शैव मत का सर्वाधिक प्रभाव कर्नाटक में है। कर्नाटक में वीर शैव या लिंगायत समाज के 18 फीसदी से ज्यादा लोग हैं।
 

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जंगमबाड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। - फोटो : ं
इसके अलावा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु भी वीर शैव मत का प्रभाव है। वीर शैव सभ्यता को द्रविड़ सभ्यता भी कहा जाता है, जिसकी जड़ें ऋग्वेद से जुड़ी हुई मानी जाती हैं। जिस सिद्धांत शिखामणि ग्रंथ के हिंदी अनुवाद का लोकार्पण प्रधानमंत्री ने किया उसके मुताबिक शिव ही परम तत्व हैं और वही जगत के सार हैं। उसी से विश्व की उत्पत्ति हुई है और उसी में उसका विलय होगा। वीर शैव की पांच पीठ, केदारनाथ के निकट वैराग्य, दक्षिण में रंभापुरी, श्रीशैल में सूर्य सिंहासन और उज्जैन में सद्धर्म और काशी में विश्वाराध्य पीठ हैं।

काशी पीठ की अलग ही महत्ता है, जिसके पीठाधीश्वर चंद्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी हैं। यह अनायास नहीं है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा प्रधानमंत्री से एक दिन पहले ही यहां आ गए थे। दक्षिण में लिंगायत को अलग धर्म बनाने की मांग जोरों पर है। ऐसे में वीर शैव मत के महत्वपूर्ण ग्रंथ के हिंदी अनुवाद के लोकार्पण को उत्तर से दक्षिण को जोड़ने की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है और काशी के कास्मोपोलिटिन समाज के अलावा दक्षिण भारतीय, कश्मीरी और महाराष्ट्र के अपने मतों को प्रधानमंत्री ने रिझाया भी है।
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