मुन्ना बजरंगी की हत्या के बाद उसके गिरोह की कमान कौन संभालेगा, इसे लेकर चर्चाओं के बाजार गर्म हैं। पुलिस के अनुसार बजरंगी की हत्या के बाद उसकी गैंग के पंजीकृत सदस्यों में से मेराजुद्दीन गिरोह की कमान संभाल सकता है।
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वहीं, दूसरी ओर चर्चाएं यह भी है कि 10 वर्ष से ज्यादा समय से फरार 50 हजार का इनामी बदमाश विश्वास शर्मा उर्फ नेपाली या फिर छह वर्ष से ज्यादा समय से फरार 50 हजार का इनामी बदमाश अजीम अहमद गैंग की कमान संभाल सकता है।
हालांकि यह तो भविष्य के गर्त में है कि गैंग की कमान कौन संभालेगा लेकिन इतना तय है कि बजरंगी की हत्या के बाद पूरा गिरोह बिखराव की स्थिति में आ गया है और जरायम जगत में बनी दखल को बरकरार रखना बड़ी चुनौती होगा।
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जेल में निरुद्ध गुर्गों में मची खलबली
मुन्ना बजरंगी की हत्या का समाचार सार्वजनिक होते ही पूर्वांचल की जेलों में बंद उसके गुर्गों में भी खलबली मच गई। जेल सूत्रों के अनुसार बजरंगी के गुर्गे उसकी हत्या से जुड़े समाचार का अपडेट जानने के लिए बेताब दिखे।
मौजूदा समय में बजरंगी का गुर्गा रिंकू सिंह गाजीपुर जेल में और मुन्नू तिवारी बांदा जेल में निरुद्ध हैं जबकि डॉक्टर उर्फ अमजद और वकील पांडेय जमानत पर जेल से बाहर है। बताया जाता है कि खुद को बजरंगी का करीबी बताकर रौब झाड़ने वाले कई लोग सोमवार को बजरंगी की हत्या के बाद बाजार में नजर नहीं आए।
शार्प शूटरों के लिए कुख्यात था बजरंगी और उसकी गैंग
मुन्ना बजरंगी
- फोटो : SELF
मुन्ना बजरंगी और उसका गिरोह शार्प शूटरों के लिए जरायम जगत में कुख्यात हुआ करती थी। पुलिस के अनुसार बजरंगी गिरोह के लिए नए शूटर खोजने का काम पुलिस मुठभेड़ में मारा गया कृपाशंकर करता था। इसके लिए वह पूर्वांचल से लेकर मुंबई तक का चक्कर लगाता रहता था।
हालांकि एक-एक कर बजरंगी के गुर्गे पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। मौजूदा समय मेें पुलिस के अनुसार बजरंगी का खास गुर्गा गाजीपुर का मूल निवासी और अशोक बिहार कॉलोनी में रहने वाला मेराज उर्फ मेराजुद्दीन खान नई दिल्ली की जेल में बंद है। वहीं, फरार विश्वास नेपाली और अजीम अहमद का एक अरसे से पता नहीं है।
मुन्ना बजरंगी का गिरोह अत्याधुनिक असलहों के साथ ही सटीक निशाने वाले शूटरों के लिए जाना जाता रहा है। पुलिस डोजियर के अनुसार बजरंगी गैंग के पंजीकृत सदस्यों में से कृपाशंकर, अनिल कुमार उर्फ मंटू यादव, दुर्गा प्रसाद अग्रहरि, रमेश उर्र्फ बाबू यादव, अनुराग उर्फ अन्नू त्रिपाठी और रिंकू गुप्ता उर्फ रविशंकर वर्ष 2003 से 2008 के बीच मारे गए।
इसके अलावा नाटे बचकानी, चंदू हरिजन, गरीब, रिंकू तिवारी भी बजरंगी के खास शूटर थे और मारे गए। हाल के दिनों में बजरंगी के गिरोह में कोई ऐसा शार्प शूटर नहीं शामिल हुआ जिसकी हनक रही हो या फिर उसने दुस्साहसिक तरीके से वारदातों को अंजाम दिया हो।
बड़े ठेके लेकर गुर्गों से करवाता था काम
- फोटो : अमर उजाला
बागपत जेल में बंद माफिया सरगना प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी के नाम का सिक्का आजमगढ़ जिले में भी खूब चलता था। जिले के प्रत्येक बड़े ठेके अक्सर वही लेता था और गुर्गों से काम कराता था। घटिया निर्माण होने के बावजूद कोई भी नेता या अधिकारी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। कुछ लोगों ने आवाज उठाई तो फोन कर धमकी दी गई। ऐसे में भय के चलते किसी ने भी केस दर्ज कराने की हिम्मत नहीं जुटाई।
पुलिस सूत्रों की मानें तो आजमगढ़ शहर में वर्षों पहले करोड़ों रुपये की लागत से सिवर लाइन पाइप बिछाने का काम शुरू हुआ। यह ठेका मुन्ना बजरंगी के नाम पर ही लिया गया था। इसके अलावा अन्य शहर में अन्य छोटी-बड़ी सडक़ों के निर्माण का भी ठेका मुन्ना बजरंगी के नाम पर ही उसके खास लोगों को दिया गया था।
उसके गुर्गे काम करवा रहे थे। निर्माण कार्य में घटिया सामग्री का प्रयोग होने पर नपा के एक पूर्व अध्यक्ष पहुंचे और काम कर रहे मजदूरों से उनका फावड़ा, तगाड़ी आदि छीनकर चले आए। अभी नपा कार्यालय में वह भी पहुंच भी नहीं पाए थे कि तभी जेल में निरुद्ध मुन्ना बजरंगी का फोन पहुंच गया।
आलम यह रहा कि उन्होंने मजदूरों से लिए गए सामान उन्हें वापस कर दिया। कुछ इसी प्रकार की घटना एक विधायक के साथ भी हुई। लेकिन मुन्ना का नाम आने पर विधायक ना केवल शांत हो गए, बल्कि केस भी दर्ज नहीं कराई।
मुन्ना का नाम बनारस में रखा गया था बजरंगी
मुन्ना बजरंगी की हत्या
- फोटो : अमर उजाला
कभी बस कंडक्टर के तौर पर काम करने वाला प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना 90 के दशक में बनारस के डिप्टी मेयर अनिल सिंह के संपर्क में आया और करीबी होता चला गया। उन दिनों बजरंगी कबीरचौरा स्थित साइकिल स्टैंड पर बजरंगी रोजाना बैठता था।
बताया जाता है कि बजरंगी के सेवाभाव और समर्पण के कारण अनिल सिंह ने मुन्ना को बजरंगी नाम दिया था। बताया जाता है कि तेजी से बढ़ते हुए बजरंगी के प्रभाव और कुछ मामलों में बात ना मानने के कारण अनिल सिंह ने बजरंगी को खुद से दूर कर दिया।
इसी बीच वैष्णो देवी जाते समय बजरंगी की फोटो पहली बार सार्वजनिक हुई तो चर्चाएं उठी कि अनिल सिंह ने पुलिस को मुहैया कराई है। इससे पहले बजरंगी की फोटो पुलिस के पास नहीं थी।
बनारस सहित पूर्वांचल के जरायम जगत में कारपोरेट कल्चर को अपनाने वाला पहला बदमाश मुन्ना बजरंगी था। इसी वजह से उसके पास सर्वाधिक संख्या मेें शूटर थे।
बजरंगी और उसके गिरोह के बदमाशों को करीब से जानने वाले पुलिसकर्मियों के अनुसार वो अपने शूटरों को निजी कंपनियों की तरह हर महीना निर्धारित तनख्वाह देता था। इसके अतिरिक्त शूटरों को ब्रांडेड कंपनी के जूते और कपड़े मुहैया कराता था। रंगदारी की लंबी रकम हाथ लगने पर वसूलने वाले शूटर को उसका एक निश्चित हिस्सा देता था।
इस वजह से बजरंगी ने 1995 से 2008 के बीच शूटरों की अच्छी-खासी खेप खड़ी की थी। इस बीच तेजी से एनकाउंटर हुए और कई शूटर मारे गए तब जाकर बजरंगी का गिरोह थोड़ा कमजोर पड़ा।
2009 में गिरफ्तार होने के बाद बजरंगी के पास पहले जैसे शार्प शूटर नहीं रह गए थे। बताया जाता है कि बजरंगी गिरोह की देखादेखी पूर्वांचल की अन्य गैंगों ने भी कारपोरेट कल्चर को अपनाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए।