हमारा सनातन धर्म वैदिक धर्म है। हमारी पूजा पद्धति भी ऋषि-मुनियों और शास्त्रों से संचालित होती है। पूजा-पाठ में आडंबर और दिखावा के जरिए आम जनता में भ्रम फैलाना गलत है। जो स्वयं कैलाश के वासी हैं उनको ठंड लगने जैसे शब्द तो बेहद गलत हैं। कैलाशवासी को रजाई ओढ़ाने की क्षमता तो पूरे ब्रह्मांड में किसी की नहीं है। ऐसा करने और कहने वाले दोनों दोषी हैं। यह कहना है काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी का।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म और देवाधिदेव महादेव के नाम पर भ्रम फैलाने वालों को कर्मकांड परिषद विधिक कार्रवाई की चेतावनी देता है। हम शासन और प्रशासन से भी इस तरह का कृत्य करने वालों पर विधिक कार्रवाई का अनुरोध करेंगे। कैलाश में रहने वाले बाबा विश्वनाथ को ठंड लग गई और हम उनको रजाई ओढ़ा रहे हैं, ऐसा नहीं कहना चाहिए। वह देवाधिदेव महादेव हैं। उनको किसी चीज की आवश्यकता नहीं हैं। हमको उनकी पूजा करने की जरूरत है।
हम ऋतु के अनुसार अपने देवी-देवताओं की पूजा पद्धति का अनुसरण करते हैं। शंख ऋषि के विधान पारिजात और कर्मकांड समुच्चय में पूजन के जो विधान बनाए हैं हम उनका पालन करते हैं। धूप, दीप, नैवेद्य का ऋतु के अनुसार चढ़ाने का विधान है। जो लोग पूजा पद्धति के नाम पर जनता में भ्रम फैलाते हैं उनको उपासना पद्धति का ज्ञान नहीं है। उनको उपासना पद्धति का अध्ययन करना चाहिए। भगवान विश्वनाथ की पूजा पद्धति में भ्रम ना फैलाएं और सस्ते शब्दों का इस्तेमाल ना करें। समझ में ना आए तो मौन रहें।
धर्म विरुद्ध आचरण, स्वभाव और नीति करने वालों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए। सनातन की पूजा पद्धति पर बेवजह भ्रम फैलाने वालों पर विधिक कार्रवाई की जाएगी। अखिल भारतीय विद्वत परिषद के राष्ट्रीय महासचिव कामेश्वर उपाध्याय ने कहा कि बाबा बर्फानी को ठंड लगने वाली बात तो हास्यास्पद है। भगवान को भोग प्रसाद अर्पित करने का विधान है। भगवान को ठंड लगने का तो हमारे पुराणों और धर्मशास्त्रों में कहीं वर्णन नहीं मिलता है। वैष्णव परंपरा में ऋतुओं के अनुसार भगवान को भोग का खास ध्यान रखता है।
रजाई शब्द ही संस्कृत का नहीं है। हमारे यहां भगवान को सौम्य वस्त्र अर्पित करने का वर्णन है। इस तरह के आडंबरों से धर्मशास्त्रों का नुकसान हो रहा है और लोग इसे परंपरा का नाम देते हैं। परंपरा के नाम पर गलत कार्य करना ठीक नहीं है। काशी में इस तरह किया जाना अनुचित है। अखिल भारतीय विद्वत परिषद इसका पुरजोर विरोध करती है। भगवान शिव तो कालकूट पीकर भी मस्त रहने वाले हैं और कैलाश उनका निवास है।
मौसम के अनुसार बदलता है बाबा का शृंगार
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्वभूषण मिश्र का कहना है कि पारंपरिक रूप से प्रत्येक वर्ष बदलते मौसम के अनुरूप, मानवीय भावना एवं आस्था के अनुरूप भक्तों की मानवीय आवश्यकताओं से साम्य की अनुभूति से बाबा विश्वनाथ के शृंगार की परंपरा रही है। यह केवल भक्तिभाव से किया जाने वाला भावपूर्ण कार्य है जिसमें भक्त द्वारा अपनी अनुभूतियों के सापेक्ष आराध्य की सेवा की जाती है। इसका कदापि आशय महादेव के किसी प्राकृतिक अथवा अन्य परिवेश से प्रभावित होने का नहीं होता।