गंगा का पावन किनारा सोमवार की शाम उत्तर-दक्षिण की नृत्य की शैलियों की नाजोअदा पर झूमा तो सूफियाने कलामों और नगमों से महका भी। लावनी लोक नृत्य से जहां पारंपरिक भावों को कलाकारों ने सजाया, वहीं बांसुरी की तान पर गंगा का सुरम्य किनारा झूम उठा।
गायन, वादन और नृत्य की त्रिवेणी में देर रात तक लोग गोता लगाते रहे। संत रविदास घाट पर गंगा महोत्सव की दूसरी निशा सुर,लय, ताल के ऐसे ही मिले जुले भावों के साथ परवान चढ़ी। भव्य मुक्ताकाशीय मंच पर शुरुआत राकेश चौरसिया की बांसुरी की तान से।
राकेश ने बांसुरी पर राग यमन की अवतारणा की। अलाप, जोड़, झाला के बाद उन्होंने छोटी, छोटी बंदिशें बजाईं। विलंबित और द्रुत लय की बंदिशों पर उन्होंने तालियां बटोरीं। पहाड़ी धुन बजाकर उन्होंने विदा ली। इनके बाद बंगलूरू से आई नृत्यांगना सुशीला मेहता ने भरतनाट्यम में गंगा अवतरण से लेकर बाबा काशी विश्वनाथ के ध्यान के भावों को पिरोया।
पुष्पांजलि के बाद उन्होंने गोमुख से गंगा के निकलने और फिर विभिन्न पड़ावों से होकर काशी आते -आते वेग शून्य हो जाने के दर्द को भरतनाट्यम के भावों में व्यक्त किया। इनके बाद दिल्ली से आई कविता द्विवेदी ने ओडिसी नृत्य पेश किया। इन्होंने भी जय जय भगवती गंगे की बंदिश पर गंगा की नृत्यमय स्तुति की।
इनके साथ गायन पर साथ दिया सुरेश कुमार सेठ ने। बांसुरी पर प्रीतिरंजन और मर्दल पर सावन कुमार साउडी ने संगत की। मुंबई की सूफी गायिका कविता सेठ ने अंदाज से भीड़ को बांधने की कोशिश की। शुरुआत की उन्होंने एक कलाम से। इसके बाद छाप तिलक सब दीनी रे मोरे नैना मिलाय के... को सब उन्होंने सुर दिया तब लोग उनका साथ देने लगे।
साणूं एक पल चैन न आए तेरे बिन... और फिर दमादम मस्त कलंदर... पर खूब तालियां बजीं। फिल्म राजनीति के गाने- मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं/द्वार जिया के खोलत नाहीं... के बोल पर उन्होंने माहौल बदला। इनके बाद मुंबई से आईं अदिति भागवत और समूह ने लावनी नृत्य के मोहक अंदाज से रंग जमा दिया।
सबसे पहले उन्होंने महिषासुर मर्दिनी पर आधारित दुर्गा स्तुति की। लावनी के उनके ठुमके लोगों को पसंद आए। उनके नृत्य पर साथ उनकी बहन ने दिया। कलाकारों को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।