श्रम साधक कबीर का मार्ग 'कागद की लिखी' का मार्ग नहीं है यह तो 'आंखन की देखी' का मार्ग है। इस पर चलना बेहद सरल है लेकिन शर्त है कि आपको कबीर जैसा बनना होगा। कबीर की श्रम साधना को प्रणाम करने और उनकी जन्म और कर्म स्थली का धूलिवंदन करने के लिए देश भर से कबीर साधक काशी पहुंचे।
मंगलवार को सुबह से ही प्राकट्य स्थली से मूलगादी तक काशी में कबीर के रंग बिखरे। मंगलवार को कबीर प्राकट्य स्थली पर महंत गोविंददास शास्त्री ने कहा कि कबीर का मार्ग प्रेम का मार्ग है। इस मार्ग में कोई भी चल सकता है लेकिन अहंकार व जाति, धर्म व संप्रदाय की संकीर्ण भावना के लिए यहां कोई गुंजाइश नहीं है।
अहंकारी, स्वार्थी व संकुचित व्यक्ति इस पर नहीं चल सकता. 'शीश उतारे भुई धरे ' की शर्त को पूरा करने वाला ही इसमें प्रवेश कर सकता है। कबीर की वाणी में प्रेम व करुणा के लिए सबसे ऊंचा स्थान है जिसने जीवन में प्रेम को पा लिया, उसने कबीर को पा लिया. सच्चे अर्थों में पंडित हो गया. 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।
कबीर की वाणी भक्ति की नहीं, क्रांति की वाणी है। सामाजिक व वैचारिक क्रांति की जगमगाती मशाल है। कबीर की साधना बाहर भटकने की बजाय अपने भीतर के उजाले को देखने की है। मन पर काबू कर विकारों को दूर कर सुख शांति की साधना है। तथागत बुद्ध की प्रेम,करुणा,मैत्री व ध्यान साधना की वाणी ही कबीर की वाणी है।