महाश्मशान मणिकर्णिका घाट
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वरयात्रा से भी भव्य होती है शवयात्रा
मणिकर्णिका घाट पर श्राद्ध कराने वाले पं.मोहित शर्मा ने बताया कि काशी में वरयात्रा से भी भव्य शवयात्रा होती है। मृत शरीर के साथ जुलूस देखकर एकबारगी भ्रम हो जाता है। लगता है कि कोई वरयात्रा द्वाराचार के लिए वधू पक्ष के द्वार की ओर बढ़ रही है। यह भ्रम तब टूटता है, जब अंतिम यात्रा के नजदीक पहुंचने पर ढोल-नगाड़ों के बीच राम नाम सत्य है सुनाई पड़ता है। तब पता चलता है कि वह वरयात्रा नहीं, शवयात्रा है। शतायु होने के बाद तो लगभग सभी जातियों-वर्गो की शव यात्राएं गाजे-बाजे और रामधुन-हर-हर महादेव के साथ निकलती हैं।
यहां मृत्यु का करते हैं इंतजार, दवा के रूप में लेते हैं गंगाजल
काशीवासी और इंटर कॉलेज में शिक्षक उमाशंकर त्रिपाठी ने बताया कि पूरे विश्व में काशी ही ऐसा शहर है, जहां हर साल 20 हजार लोग मौत की इच्छा के साथ आते हैं। यहां मुक्ति भवन, मुमुक्षु भवन सहित 200 से ज्यादा मुक्ति भवन बने हैं। जहां दिनों, महीनों, यहां तक कि वर्षों तक मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जिसका अर्थ जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति है। इन भवनों में साधु, गृहस्थ और बटुक-सभी रहते हैं।