जयशंकर प्रसाद की प्रतिमा की स्थापना के लिए प्रयास कर रहे अधिवक्ता नित्यानंद राय ने बताया कि परिवार के झगड़े में कामायनी तो राष्ट्रीय अभिलेखागार में पहुंच गई। दुखद पहलु यह है कि परिवार की मुकदमेबाजी में जयशंकर प्रसाद की स्मृतियों से देश आज भी अनजान है। उनकी कलम, रुद्राक्षमाला, भस्मपात्र, नेपालीखुखरी जो नेपाल नरेश ने दी थी, चश्मे का लेंस, एकमात्र दांत, वस्त्र, प्रसादजी की कटोरी, गिलास चम्मच सब बक्से में बंद होकर खराब हो रहा है।
कामायनी लेखन पर जो हिंदी साहित्य सम्मेलन ने संवत 1994 में ताम्रपत्र, मंगलाप्रसाद पारितोषिक दिया था, नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा संवत 1982 में मिला गुलेरीपदक और संवत 1991 में सुधाकर पदक परिवार के एक पक्ष के कब्जे में है। कोई दूसरा आज तक उनका दर्शन नहीं कर सका है। आंसू, इरावती, दाशराज युद्ध, तितली, लहर के गीत एवं स्फुट कविताएं, ध्रुवस्वामिनी, चन्द्रगुप्त की मूल पांडुलिपियां दिल्ली में हैं या फिर बक्से में बंद कोई ठीक -ठीक बताने की स्थिति में नहीं है।