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Varanasi: ऑनलाइन होंगी पांडुलिपियां, तीन चरणों में दुर्लभ पांडुलिपियों का होगा संरक्षण

Sat, 23 Dec 2023 12:57 PM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

शुक्रवार को कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने पांडुलिपि संरक्षण के लिए राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के निदेशक डॉ. अनिर्वाण दास के साथ पांडुलिपि संरक्षण के लिए कुलपति कार्यालय व सरस्वती भवन में बैठक की। डॉ. अनिर्वाण दास ने बताया कि विश्वविद्यालय में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण तीन चरणों में किया जाएगा।
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन में संरक्षित प्राच्य विद्या को जल्द ही दुनिया के सामने लाया आएगा। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के सहयोग से दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण के साथ ही उन्हें डिजिटल करने की तैयारी है। पेमेंट गेटवे के जरिये इसे ऑनलाइन माध्यम से जनसुलभ बनाया जाएगा। इससे विश्वविद्यालय की आय में भी वृद्धि होगी।

शुक्रवार को कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने पांडुलिपि संरक्षण के लिए राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के निदेशक डॉ. अनिर्वाण दास के साथ पांडुलिपि संरक्षण के लिए कुलपति कार्यालय व सरस्वती भवन में बैठक की। डॉ. अनिर्वाण दास ने बताया कि विश्वविद्यालय में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण तीन चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में सूचीकरण, दूसरे चरण में कंजर्वेशन और तृतीय चरण में डिजिटलाइजेशन होगा। इस कार्य में तीन वर्ष का समय लगेगा। 40 प्रशिक्षित प्रशिक्षकों के साथ संरक्षण का कार्य होगा। पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए 40 प्रशिक्षकों के पद के लिए 168 आवेदन प्राप्त हुए हैं। इसमें से 40 प्रतिभागियों का चयन प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा। पांडुलिपि प्रशिक्षण के लिए 40 प्रतिभागियों को 15 दिन का प्रशिक्षण मिलेगा। पांडुलिपि प्रशिक्षण के बाद विशेषज्ञों का दल पांडुलिपियों का संरक्षण करेगा। बैठक में कुलसचिव राकेश कुमार, प्रो. हरिशंकर पांडेय, उप पुस्तकालय अध्यक्ष डॉ. दिनेश कुमार तिवारी उपस्थित थे।

संरक्षण के लिए पांच करोड़ रुपये सरकार ने दिया

पांडुलिपि संरक्षण के लिए पांच करोड़ रुपये केंद्र सरकार ने दिया है। इसके साथ ही और जरूरत होने पर सरकार धन उपलब्ध कराती रहेगी। सूचीकरण के बाद शोध के लिए पेमेंट गेटवे की सुविधा शुरू कराकर पांडुलिपियों की प्रति उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है।

 

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वाराणसी का संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय (एसएसयू) - फोटो : SSU

जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद शुरू होगा संरक्षण कार्य

संस्कृति मंत्रालय ने यहां रखीं दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए इंदिरा गांधी कला केंद्र के राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन को जिम्मेदारी सौंपी है। पांडुलिपियों को एक उपचार के माध्यम से संरक्षित किया जाएगा। संरक्षण का कार्य जनवरी के दूसरे सप्ताह में शुरू किया जाएगा।

सरस्वती भवन पुस्तकालय-

हस्तलिखित पांडुलिपियों का केंद्र सरस्वती भवन पुस्तकालय का शिलान्यास 16 नवंबर 1907 को सर जान हीवेट ने किया था। लगातार सात वर्षों तक संस्कृति और संस्कृत के प्रेमी उदार राजाओं, महाराजाओं, श्रेष्ठ नागरिकों और कर्तव्यनिष्ठ राजकीय कर्मचारियों के अनवरत प्रयास से पुस्तकालय का वर्तमान भव्य भवन 1914 में निर्मित हुआ। छह फरवरी 1914 के शुभ मुहूर्त पर संयुक्त प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जेम्स स्कोर्गी मेस्टन केसीएसआई की अध्यक्षता में इस पुस्तकालय का उद्घाटन समारोह हुआ। इसका नाम प्रिंसेज ऑफ वेल्स सरस्वती भवन पुस्तकालय रखा गया। पुस्तकालय को स्वतंत्र भवन प्राप्त होने पर 24 अप्रैल 1914 को महामहोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज प्रथम पूर्णकालिक ग्रंथालय अध्यक्ष नियुक्त हुए। इसके बाद डॉ. मंगल देव शास्त्री, पं. विश्वनाथ झारखंडी, पं. नारायण शास्त्री खिस्ते, लक्ष्मी नारायण तिवारी आदि ने पद को सुशोभित किया।

 

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96 हजार दुर्लभ पांडुलिपियां संरक्षित

सरस्वती भवन पुस्तकालय में वेद, ज्योतिष, वेदांग, पुराण, व्याकरण आदि विषयों की 96 हजार दुर्लभ पांडुलिपियां संरक्षित की गई हैं। इनमें मुख्यतः श्रीमद्भागवतम् (पुराण) संवत-1181 देश की प्राचीनतम कागज आधारित पांडुलिपि है। भगवद्गीता (पुराण) की स्वर्णाक्षरों में लिपि है। दुर्गा सप्तशती कपड़े के फीते पर दो इंच चौड़ाई रील में अति सूक्ष्म (संवत 1885 मैग्नीफाइड ग्लास से देखा जा सकता है। रासपंचाध्यायी (सचित्र) पुराणोतिहास विषय से युक्त देवनागरी लिपि (स्वर्णाक्षर युक्त) इसमें श्री कृष्ण जी के सूक्ष्म चित्र निहित हैं। कमवाचा (त्रिपिटक पर अंश), वर्मी लिपि- लाख पत्र पर स्वर्ण की पालिश।

ऋग्वेद संहिता भाष्यम इसके साथ ही यहां लाह, भोजपत्र, कपड़ा काष्ठ एवं कागज आदि पर लिपिबद्ध पांडुलिपियां संरक्षित की गई हैं। इसके साथ ही ये पांडुलिपियां देवनागरी, खरोष्ठी, मैथिली, उड़िया, गुरुमुखी, तेलगु, कन्नड़ और संस्कृत की विभिन्न लिपियों में लिखी गई हैं।

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