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वाराणसी फ्लाईओवर हादसाः देर रात घटनास्थल पहुंचे CM योगी, घायलों से पूछा हाल

Wed, 16 May 2018 10:45 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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घटनास्थल पर पहुंचे सीएम योगी - फोटो : अमर उजाला
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वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन के समीप निर्माणाधीन फ्लाईओवर हादसे का जायजा लेने के लिए मुक्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मंगलवार देर रात पहुंचे। उनसे पहले हादसे की जानकारी मिलने पर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने नौ बजे शहर पहुंच कर दुर्घटनास्थल का मौका-मुआयना किया। रात 11:45 बजे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शहर पहुंच गए।
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उप मुख्यमंत्री मौर्य ने उप्र सेतु निगम के चार अभियंताओं को निलंबित कर दिया है। इसमें चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर एचसी तिवारी, प्राजेक्ट मैनेजर केआर सूदन, सहायक अभियंता राजेश सिंह और अवर अभियंता लालचंद शामिल हैं। हादसे की जांच के लिए तकनीकी टीम का गठन किया गया है।  हादसे के बाद बनारस पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सर्किट हाउस में कहा कि घटना में 15 लोगों की मौत हुई और 11 घायल हैं।

सीएम योगी ने कहा कि इस हादसे की हकीकत जानने के लिए तीन सदस्यीय तकनीकी टीम का गठन किया गया है। टीम की रिपोर्ट के बाद जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी। यह घटना बहुत दुखद है। हादसे के बाद ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुझसे जानकारी ली और इसके बाद मैंने उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य को यहां भेज दिया था। हमारी प्राथमिकता घायलों को बेहतर इलाज देने की है।
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हादसे में मृतकों को पांच लाख, गंभीर घायलों के दो लाख और घायलों को 50-50 हजार रुपये की मदद की जा रही है। बता दें कि निर्माणाधीन चौकाघाट-लहरतारा फ्लाईओवर के दो बीम मंगलवार शाम सड़क पर गिर पड़े। बीम के नीचे एक महानगर सेवा की बस सहित दर्जन भर वाहन दब गए। बीम के नीचे दबे वाहनोें को गैस कटर से काट कर सेना और एनडीआरएफ के जवानों ने 18 शव और 30 से अधिक घायलों को बाहर निकाला है।

घायलों में 14 की हालत गंभीर बताई गई है। हादसे के लगभग आधा घंटे बाद पुलिस पहुंची और तकरीबन डेढ़ घंटे बाद राहत और बचाव कार्य शुरू हुआ। जिन बीम के नीचे वाहन दबे थे, उसे हटाने के लिए एक-एक कर 11 क्रेन आईं लेकिन उसे उठा नहीं सकीं।

सभी 11 क्रेन की मदद से बीम को हल्का सा उठाया गया तो दो ऑटो, दो बोलेरो, दो कार, तीन बाइक और एक अप्पे को बाहर निकाल कर महानगर बस को खींचा गया। रात 10 बजे राहत कार्य का पहला चरण समाप्त हो गया।  इस दौरान देरी से राहत और बचाव कार्य शुरू होने के कारण भीड़ में मौजूद लोगों ने पुलिस-प्रशासन के विरोध में कई बार नारेबाजी की।

सेतु निगम ले आता जेसीबी तो बच जाती कई की जान
हादसे के बाद फ्लाईओवर निर्माण कार्य से जुड़े लोग मौके से भाग निकले। दरअसल, कई हजार टन वजनी बीम को सेतु निगम कंप्रेशर वाली भारी क्षमता की जेसीबी से उठवा कर पिलर पर रखवाता है। मगर, हादसे के बाद सेतु निगम के अधिकारियों ने अपनी जेसीबी नहीं मंगवाई और राहत-बचाव कार्य शुरू होने में ही घंटों लग गए।

देर से शुरू हुआ राहत कार्य, आधे घंटे बाद पहुंची पुलिस

हादसा - फोटो : amar ujala
बीम गिरने के बाद चंद कदम दूर तैनात पुलिस आधा घंटे बाद मौके पर पहुंची। इससे पहले स्थानीय लोगों ने ही फंसे लोगों को बाहर निकाला। यही वजह रही कि जब पुलिस ने बचाव कार्य शुरू किया तो स्थानीय लोगों का जबरदस्त विरोध झेलना पड़ा। 

प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो लगभग साढ़े पांच बजे दो बीम गिरीं। एईएन कॉलोनी व आसपास के लोगों ने किनारे दबे लोगों को कड़ी मशक्कत के बाद बाहर निकाला। इसके बाद अंदर फंसे लोगों को निकालने में जुट गए। लगभग छह बजे मौके पर फोर्स पहुंची। फिर भी स्थिति जस की तस रही।

साढ़े छह बजे के लगभग क्रेन मौके पर पहुंचीं। जाम और फिर बीम गिरने के स्थान पर जगह न होने की वजह से रेलवे कॉलोनी की बाउंड्री तोड़ी गई और बचाव कार्य शुरू हो पाया। एनडीआरएफ के आने के बाद बचाव कार्य में तेजी आई। लगभग साढ़े सात बजे लोगों को निकाला जाना शुरू हुआ। 

यही नहीं, स्वास्थ्य विभाग की टीम भी साढ़े सात बजे मौके पहुंची। इससे लोगों को समय से इलाज नहीं मिल पाया। रेलकर्मी घायलों को लेकर रेलवे के अस्पताल पहुंचे पर वहां भी प्राथमिक उपचार नहीं मिल पाया। नतीजतन तमाम लोग खून बहने के  बाद भी इलाज के अभाव में तड़पते रहे।

इंजीनियरिंग पर काला धब्बा 
 निर्माणाधीन फ्लाईओवर के दो बीम गिरने से हुआ हादसा बनारस के इंजीनियरिंग पर काला धब्बा बन गया है। इंजीनियरिंग से जुड़े जानकारों का मानना है कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी और पिलर पर रखे बीम का संतुलन बिगड़ने के कारण दुर्घटना हुई है। हालांकि जिस पिलर पर बीम रखे हुए थे, वह पुरानी स्थिति में हैं

सेतु निगम के रिटायर्ड इंजीनियर आरके सिंह और पीडब्ल्यूडी के रिटायर्ड इंजीनियर केएम श्रीवास्तव का इंजीनियरिंग में पहला अध्याय सिखाया जाता है कि काम वाली साइट पर खून की एक बूंद नहीं गिरनी चाहिए।

हादसा इंजीनियरिंग की तकनीक पर सवाल खड़े करता है। सिंचाई विभाग के रिटायर्ड इंजीनियर वीके जायसवाल ने कहा कि जहां ओवरहेड काम होता है, वहां अधिक सावधानी बरती जाती है। काम कराने वाले ही बता सकते हैं कि वहां क्या कमी रह गई थी।

इधर हादसा, उधर जाम से कराह उठा शहर

- फोटो : अमर उजाला
निर्माणाधीन चौकाघाट-लहरतारा फ्लाईओवर पर हादसे के बाद एक तरफ चीख-पुकार मची तो दूसरी तरफ अफरातफरी के बीच जाम की जकड़न में शहर कराह उठा। कैंट, लहरतारा मार्ग ब्लाक होते ही सभी प्रमुख मार्गों पर ट्रैफिक की रफ्तार थम गई। अंधरापुल-चौकाघाट से रथयात्रा, मलदहिया, मैदागिन, लंका से मंडुवाडीह तक  सभी तिराहे-चौराहे जाम की चपेट में आ गए।

हादसे में मृतकों और घायलों को ट्रॉमा सेंटर और मंडलीय अस्पताल पहुंचाने में भी जाम के चलते खासी दिक्कतें हुईं। हालांकि तत्काल मुख्य मार्गों से गुजर रहे वाहनों को लिंक मार्गों पर डायवर्ट कर एंबुलेंसों के रास्ता खाली करा दिया गया। 

इसके बाद मुख्य मार्गों के साथ ही लिंक मार्ग और उससे लगीं गलियाें में भी भीषण जाम लग गया। हालात संभालने के लिए कई मार्गों को वन-वे कर दिया गया और वैकल्पिक मार्गों पर डायवर्जन कर किसी तरह वाहनों का गुजारा गया लेकिन कैंट-लहरतारा होते हुए हाईवे से गुजरने वाले वाहनों का दबाव शहर में बढ़ने से स्थिति संभलाना टेढ़ी खीर बन गया।

कैंट के आगे रास्ता बाधित होने के बाद सिगरा-रथयात्रा, लंका होते हुए छोटे चारपहिया वाहन सामनेघाट पुल और डाफी के रास्ते हाईवे की तरफ निकल रहे थे। वहीं, हाईवे से शहर आने वाले यात्री वाहनों को मंडुवाडीह चौराहे से महमूरगंज तिराहा-सिगरा मार्ग होते हुए कैंट की तरफ निकाला जा रहा था।

इससे सड़कों पर यातायात का दबाव इतना अधिक हो गया कि पैदल चलने के लिए भी जगह नहीं मिल रही थी। रात नौ बजे के बाद किसी तरह स्थिति कुछ नियंत्रित हुई। हालांकि गलियों, लिंक मार्गों पर वाहनों का डायवर्जन जारी रहा और जगह-जगह जाम के चलते राहगीरों की मुश्किलें बनी रहीं। 
 

भगदड़ में 25 मौतों के बाद तो आपदा प्रबंधन सीख लिए होते

- फोटो : अमर उजाला
 अक्तूबर, 2015 मेें जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था की ओर से निकाली गई जनजागरण शोभायात्रा में भगदड़ मचने से राजघाट पुल पर 25 लोगों की मौत हो गई थी। इस हादसे के दौरान जिला पुलिस और प्रशासन के आपदा प्रबंधन की पोल खुल गई थी। तय हुआ था कि आपदा प्रबंधन के बारे में जिला प्रशासन और पुलिस अब गंभीरता बरतेगा लेकिन सारी कवायदें कागजों तक ही सीमित रह गईं।

मंगलवार की शाम कैंट रेलवे स्टेशन के समीप निर्माणाधीन फ्लाईओवर की दो बीम गिरी तो एक बार फिर जिला पुलिस और प्रशासन के आपदा प्रबंधन की कलई खुल गई। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मातहतों के साथ मौके पर तो पहुंचे लेकिन कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं थे।

भीड़ को तितर-बितर करने और क्रेनों को मौके पर बुलाने के अलावा कोई अधिकारी इस स्थिति में नहीं दिखा कि वो आगे बढ़ कर नेतृत्व कर सके और राहत-बचाव के कार्य में तेजी लाई जा सके। हालात कुछ इस कदर थे कि बीम के नीचे दबे वाहनों से घायलों और मृतकों को निकालने के बाद एंबुलेंसों को आगे बढ़ने के लिए भीड़ के कारण रास्ता नहीं मिल पा रहा था।

मंगलवार को भी ऐसा हुआ, यहां भी प्रशासन की चूक की वजह हादसा हुआ और लापरवाही की वजह से राहत व बचाव कार्य समय से शुरू नहीं हो पाया। सेतु निगम के लापरवाह और जिम्मेदारों पर कार्रवाई हुई, मगर इस हादसे के लिए पूरी प्रशासनिक मशीनरी जिम्मेदार है, मगर अब हर कोई अपनी कमी छिपाने में जुटा है।

 

एक-एक कर गिरीं बीम और क्रैक हो गईं

varanasi - फोटो : अमर उजाला
फ्लाईओवर के बीच वाली बीम पहले जमीन पर गिरी और बीच से क्रैक हो गई। इसी बीम के धक्के से किनारे वाली बीम भी सड़क पर गिरी और जाम के कारण नीचे खड़े वाहन दब गए। बीच वाली बीम क्यों गिरी और कैसे क्रैक हुई? 

घटनास्थल पर पहुंचे सिविल इंजीनियरिंग के जानकारों का कहना था कि बीम को फ्लाईओवर के पिलर के ऊपर सही तरीके से नहीं रखा गया होगा। इसके बाद बीम की सेटिंग करने के दौरान रस्से से उसे खींचने के समय असावधानी बरती गई होगी और संतुलन बिगड़ने से वह जमीन पर गिर गई होगी। हालांकि जिला पुलिस और प्रशासन के अधिकारी यह नहीं बता पाए कि दोनों बीम कैसे जमीन पर गिरीं?  

बीम गिरने के हादसे के पीछे सही एलाइंमेंट नहीं होना माना जा रहा है। मौके पर पहुंचे विकास प्राधिकरण और नगर निगम के अभियंताओं ने भी यह बात मानी कि फ्लाईओवर निर्माण के वक्त बीम रखने में एलाइंमेट सबसे अहम होता है। उसी में लापरवाही से यह हादसा हुआ है। कारण बीम रखने के दौरान दबाव बनता है और उससे प्रेशर बनता है। कई बार प्रेशर बनने से उसका बैलेंस बिगड़ने की आशंका रहती है।

आईआईटी बीएचयू, सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. बृंद कुमार ने कहा कि हादसे के पीछे इंजीनियरिंग की तकनीक का अभाव है। बीम गिरने के बाद वह टूटा नहीं, अगर गुणवत्ता खराब होती तो वह गिरने पर बीच से टूट जाता।

किसी भी बीम को जब जब पिलर पर रखते हैं, तो उसका दबाव बराबर होना बहुत जरूरी होता है। चूंकि समतल जमीन पर बीम को रखना नहीं था, ऐसे में बीम का दबाव एकतरफा हो गया और वह दबाव नहीं सह सका और गिर गया।  

संयोग अच्छा था कि डीजल-पेट्रोल बहा लेकिन आग नहीं लगी

- फोटो : अमर उजाला
 निर्माणाधीन चौकाघाट-लहरतारा फ्लाईओवर की सड़क पर गिरी बीम के नीचे दबे वाहन मंगलवार की शाम घंटों स्टार्ट रहें और उनका डीजल-पेट्रोल रिसता रहा। संयोग अच्छा था कि वाहन स्टार्ट थे और फ्यूल बह रहा था लेकिन आग नहीं लगी।

यदि इस बीच किसी वाहन में लगने पाती तो घटनास्थल पर जुटी भीड़ में शामिल लोग भी चपेट में आ जाते। शायद तब और ज्यादा बड़े पैमाने पर जनधन की हानि होती।

कैंट रेलवे स्टेशन के समीप फ्लाईओवर की दो बीम गिरने के बाद राहत और बचाव कार्य के दौरान भारी लापरवाही बरती गई। स्टार्ट वाहनों और उनका फ्यूल रिसते देख भी फायर ब्रिगेड की गाड़ी को नजदीक नहीं बुलाया गया। बीम को घेरे लोगों को तितर-बितर करने की पुलिस ने कई बार की कोशिश की और समझाया भी लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।

वहीं, बीम के नीचे से जिन वाहनों को निकाला जा रहा था उनका इंजन बंद करने के लिए भी राहत और बचाव कार्य में जुटे पुलिसकर्मियों ने रुचि नहीं दिखाई। जानकारों का कहना था कि बुरी तरह से क्षतिग्रस्त और स्टार्ट वाहनों में रिसते फ्यूल से आग लगती तो तेज धमाका हो सकता था लेकिन संयोग अच्छा था और ऐसा कुछ नहीं हुआ।

एनडीआरएफ और सेना के जवान जुटे जी-जान से

हादसा - फोटो : amar ujala
फ्लाईओवर हादसे के तकरीबन डेढ़ घंटे बाद शुरू हुए राहत और बचाव कार्य में 11 एनडीआरएफ की सात टीमें लगाई गई। इन सात टीमों में एनडीआरएफ के 280 जवान शामिल थे और गैस कटर, ऑक्सीजन सिलेंडर से लेकर प्राथमिक उपचार की सभी सामग्रियों से लैस थे। जिस बीम के नीचे वाहन दबे थे उसके हल्का से उठने पर वाहनों को गैस कटर से काट कर एनडीआरएफ के जवान घायलों बौर मृतकों को बाहर निकाल रहे थे।

उधर, जिला प्रशासन के बुलावे पर 39 जीटीसी से थल सेना के जवानों की टुकड़ी भी आई और राहत-बचाव के कार्य में एनडीआरएफ के जवानों का कंधे से कंधा मिलाकर सभी ने साथ दिया।

घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने एनडीआरएफ और सेना के जवानों की हौसलाअफजाई की। जैसे ही वाहन बीम के नीचे से निकल रहे थे हर बार भीड़ हर-हर महादेव का उद्घोष कर रही थी।

एक बीम के सामने 11 क्रेन बेअसर

- फोटो : अमर उजाला
निर्माणाधीन फ्लाईओवर के जिस बीम के नीचे वाहनों में लोग दबे पड़े थे उसे उठा कर हटाने के लिए 11 क्रेन लगाई गई थी। इसी वजह से रेलवे की एईएन कॉलोनी की सड़क की तरफ की दीवार को भी तोड़ा गया लेकिन 11 क्रेन मिलकर भी एक बीम के आगे पूरी तरह से बेअसर नजर आईं। 

हालत यह थी कि क्रेनें जब पूरी ताकत के साथ बीम को उठाने का प्रयास कर रही थी तो वो जमीन से तीन-चार फीट ऊपर उठ जा रही थी। घटनास्थल के चौतरफा एकत्र भीड़ के लिए 11 क्रेनों का बीम उठाने का प्रयास चर्चा का विषय रहा और सभी एक-दूसरे से यह पूछते नजर आए कि आखिरकार सेतु निगम इन्हें इतनी ऊंचाई तक उठाकर कैसे पिलर पर रखवाता होगा।

भीड़ में शामिल लोग बार-बार मांग कर रहे थे कि सेतु निगम के उसी क्रेन को मंगवाया जाए जिससे बीम उठा कर पिलर पर रखी जाती है। पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने भी सेतु निगम के अभियंताओं से संपर्क कर उसी क्रेन को बुलाने की मांग की लेकिन सफलता नहीं मिली।
 
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कार्रवाई कर देते तो शायद नहीं होता हादसा

- फोटो : अमर उजाला
फ्लाईओवर के दो बीम गिरने से हुई मौतों की कसूरवार पुलिस भी है। निर्माण कार्य के दौरान राहगीरों की सुरक्षा के प्रति गंभीरता न बरतने, ट्रैफिक वालंटियर्स को तैनात न करने और अराजकतापूर्ण तरीके से कार्य करने के आरोप में 19 फरवरी को सेतु निगम के परियोजना प्रबंधक के खिलाफ सिगरा थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। मुकदमा दर्ज करने के बाद सिगरा पुलिस ने कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डाल दिया। वहीं, सेतु निगम के परियोजना प्रबंधक ने मुकदमे को हल्के ढंग से लेते हुए लापरवाह तरीके से निर्माण कार्य जारी रखा।

यही नहीं, ट्रैफिक पुलिस ने भी कभी सेतु निगम से नहीं पूछा कि क्यों उपेक्षापूर्ण तरीके से निर्माण करा कर राहगीरों की जान को रोजाना खतरे में डाला जा रहा है। ट्रैफिक पुलिस की ओर से सेतु निगम के खिलाफ कभी कार्रवाई की संस्तुति भी पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को नहीं की गई।

एसएसपी राम कृष्ण भारद्वाज ने इस साल जनवरी से फरवरी के बीच चौकाघाट फ्लाईओवर के निर्माण कार्य का तीन बार निरीक्षण किया था। एसएसपी ने सेतु निगम के परियोजना प्रबंधक को कहा था कि लहरतारा से अंधरापुल के बीच 30 ट्रैफिक वालंटियर्स तैनात किए जाएं। प्रोटेक्शन वॉल को और अंदर की ओर किया जाए। निर्माण कार्य ऐसे हो कि जाम न लगे और मलबा तत्काल हटा लिया जाया करे।  

तीन बार की ताकीद के बाद भी जब सेतु निगम के परियोजना प्रबंधक पर असर नहीं पड़ा तो एसएसपी ने सिगरा थाने में उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। इसके बाद सिविल पुलिस और ट्रैफिक पुलिस ने कभी दोबारा झांक कर सेतु निगम के कामकाज के तौर-तरीके का जायजा नहीं लिया। 


 
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