‘अज बनारस न रवम माबदे आम ईजा अस, हर ब्रह्मन बिसरे लक्ष्मनो राम ईजा अस...’ (बनारस इबादत की एक खास जगह है, मैं इसे छोड़कर अब कहीं नहीं जाऊंगा, यहां के हर ब्राह्मण के बेटे में मुझे राम और लक्ष्मण का अक्स नजर आता है)। फारसी के मशहूर आलिम व दरगाह-ए-फातमान के संस्थापक अल्लामा शेख अली हजी को जब हिंदुस्तान से वापस ईरान बुलाया गया था, तो उन्होंने यही कहा था।
आज से करीब 300 साल पहले कई मुल्कों से होते हुए ईरान के मशहूर आलिमेदीन अल्लामा शेख अली हजी बनारस आए थे। यहां आकर उन्होंने तालीम का इदारा शुरू किया। बनारस के खानवादे को उन्होंने फारसी की तालीम देनी शुरू कर दी। महाराजा चेतसिंह के खानदान के लोगों को भी उन्होंने फारसी पढ़ाया।
इसी के एवज में महाराज ने उन्हें फातमान की कई एकड़ जमीन दे दी जो कि आज शिया समुदाय की इबादत का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। यहां उस्ताद बिस्मिल्लाह खां समेत कई अजीम शख्सियतों की मजार है। मरते दम तक शेख अली हजी बनारस ही रहे। उनका रौजा भी यहीं है।
17 जनवरी गुरुवार को संस्थापक की 260वीं बरसी है। कल बरसी पर फातमान में मजलिस होगी, उनके रौजे पर 260 शमा रौशन की जाएगी। मजार को गुलाब की पंखुड़ियों से सजाया जाएगा। मौलाना जमीरुल हसन, मौलाना अकील हुसैनी, मौलाना नदीम असगर और डॉ. शफीक हैदर की मौजूदगी रहे। संयोजक हाजी सैयद फरमान हैदर और मुतवल्ली सैयद अब्बास रिजवी शफक के जेरे निगरानी में होने वाले कार्यक्रम में सभी धर्मों के लोग फातिहा पढ़ने के लिए हाजिर रहेंगे।