1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहराया गया तो उनकी शहनाई ने भी वहां आजादी का संदेश बांटा था। अपने जीवन काल में उन्होंने ईरान, इराक, अफगानिस्तान, जापान, अमेरिका, कनाडा और रूस में अपनी शहनाई की जादुई धुनें बिखेरीं। उन्होंने गूंज उठी शहनाई, सत्यजीत रे की फिल्म जलसाघर में संगीत दिया। अखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिंदी फिल्म स्वदेश में शहनाई का जादू चलाया था।
नाते-रिश्तेदारों को है सरकारी मदद की दरकार
भारत रत्न के पोते आफाक अहमद ने बताया कि दादा के जाने के बाद से न तो अधिकारी आते हैं और न ही उनके चाहने वाले। परिवार के पास शहनाई के अलावा और कोई दूसरा हुनर नहीं है। हम लोग आज भी शहनाई वादन के जरिए ही परिवार का गुजारा कर रहे हैं। उस्ताद का पूरा कुनबा हड़हा सराय के मकान में ही रहता है। कुछ लोग बाहर चले गए हैं तो कुछ ने दूसरी जगह अपने आवास बना लिए हैं।
पद्मविभूषण पं. छन्नू लाल मिश्र एक बार का वाकया बताते हैं कि राय कृष्ण दास के बगीचे में रामचरित मानस का पाठ रखा गया था। पं. बैजनाथ ने उस्ताद से कहा कि अंतिम दिन शहनाई बजा देता त मजा आ जात...। बिस्मिल्लाह ने कहा बिल्कुल आएंगे। बैजनाथ ने कहा कि गाड़ी भेज दें तो बिस्मिल्लाह का जवाब था भगवान के काम में कैसी गाड़ी, फिर समापन के दिन हड़हा सराय से पैदल ही चार किलोमीटर दूर बागीचे में पहुंच गए। तबले पर संगत के लिए पं. किशन महाराज थे।
शिया जामा मस्जिद के हाजी फरमान हैदर ने बताया कि एक बार अमेरिकी राष्ट्रपति ने अमेरिका में बस जाने का न्योता दिया। 1955 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने उनकी शहनाई सुनी तो उन्हें लंच पर आमंत्रित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पूछा आपके घर में कितने लोग हैं।
उस्ताद ने कहा कि 54 लोग। राष्ट्रपति ने कहा कि खाने पर कितना खर्च आता है। उस्ताद ने पूछा कि यह क्यों पूछ रहे हैं तो राष्ट्रपति ने कहा कि जितना भी खर्च आता है उसका दोगुना देंगे। तनख्वाह देंगे। घर देंगे अमेरिका बस जाओ। बिस्मिल्लाह ने जवाब दिया साहेब बस तो जाएं, लेकिन सुबह-सुबह जब हम घर से निकलते हैं और दोनों तरफ लोग खड़ा होकर आदाब-आदाब करते हैं वो मंजर हमें यहां कहां से मिलेगा।