निकाय चुनाव की बिछी बिसात में देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी सियासी चक्रव्यूह में फंसी है। मतदाताओं की खामोशी ने प्रत्याशियों के दिल की धड़कन बढ़ा दी है। इस चुनाव में विपक्ष की मजबूत रणनीति और चुनावी कौशल ने भाजपा के माथे पर बल डाल दिया है। भाजपा ने इस बार अशोक तिवारी को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा के सामने अपने मतों को सहेजने के साथ ही मत फीसदी बढ़ाने की चुनौती है। उधर, सपा ने नगर निगम में कई बार पार्षद रहे डॉ. ओपी सिंह को प्रत्याशी बनाया है। एकजुट मुस्लिम मतों के साथ ही हिंदू मतों में सेंधमारी से यह भाजपा के सामने बड़ी चुनौती बने हैं।
ऐसे ही कांग्रेस ने पांच बार विधानसभा चुनाव में भाग्य आजमा चुके अनिल श्रीवास्तव को मैदान में उतारा है। इसके जरिये कांग्रेस मुस्लिम मतों के साथ ही हिंदू और खासकर कायस्थ मतों पर भरोसा कर रही है। बसपा ने सुभाष चंद्र माझी, आप से शारदा टंडन, सुभासपा से आनंद तिवारी भी समीकरणों में उथल पुथल कर रहे हैं। निकाय चुनाव की इस अग्निपरीक्षा से सियासी दल आगामी लोकसभा चुनाव की भी ताप मापना चाहते हैं।
बस में सवार होते मतदानकर्मी
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वाराणसी का चुनाव इस मायने में भी खास है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है और काशी देश भर में विकास के मॉडल के रूप में पहचान बना चुकी है। इसके साथ ही प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर, राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार रविंद्र जायसवाल, दया शंकर मिश्र दयालू की साख भी दांव पर लगी है। इसके साथ ही वाराणसी के कई दिग्गज नेता केंद्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। ऐसे में वाराणसी के परिणाम पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
वाराणसी नगर निगम में वर्ष 2017 के चुनाव के बाद 87 गांवों का विलय किया गया और इसके बाद रामनगर नगर पालिका व सूजाबाद नगर पंचायत को भी नगर निगम में शामिल किया गया है। शहर के आसपास के 87 गावों के जातीय समीकरण भी सभी सियासी दलों के समीकरणों को मुश्किल में डाल रहे हैं।