संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत की साधना का प्रमुख केंद्र है। महाविद्यालय से विश्वविद्यालय बनने की यात्रा में 167 साल का अथक प्रयास और संस्कृत के विद्वानों की तपस्या ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रविवार को विश्वविद्यालय का 65वां स्थापना दिवस समारोह मनाया जाएगा।
कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने बताया कि यह विश्वविद्यालय मूलत: शासकीय संस्कृत महाविद्यालय था। इसकी स्थापना सन 1791 में की गई थी। वर्ष 1894 में सरस्वती भवन ग्रंथालय का निर्माण हुआ जिसमें हजारों पांडुलिपियां संग्रहीत हैं। चैत्र शुक्ल पत्र में 22 मार्च 1958 को प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के विशेष प्रयास से इसे विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। उस समय इसका नाम वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय था। 1974 में इसका नाम बदलकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय रख दिया गया। यहां पर प्रथम शिक्षक पं. काशीनाथ थे।
कुलपति प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि सरस्वती भवन पुस्तकालय में एक लाख 11 हजार दुर्लभ पांडुलिपियों को संग्रहीत किया गया है। प्राच्य विद्या का यह संस्थान अब समय के साथ कदम से कदम मिलाकर डिजिटल शिक्षा की ओर तेजी से बढ़ रहा है। विश्वविद्यालय में कर्मकांड, पौरोहित्य, ज्योतिष के डिजिटल पाठ्यक्रम की शुरुआत होने जा रही है। सरस्वती भवन में संग्रहीत पांडुलिपियों के ज्ञान को भी डिजिटल करने की कवायद शुरू की जा रही है।