पुलिस का दावा था कि राजेंद्र ने अपने शॉल के सहारे पंखे से लटक कर जान दे दी थी। मौत के अगले दिन बीएचयू में पोस्टमार्टम कराया गया जिसे मंडलीय अस्पताल के तत्कालीन डॉ. केके जैन ने किया था। डॉ केके जैन ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट दी और मौत का कारण दम घुटने से मौत बताई। रिपोर्ट के मुताबिक राजेंद्र ने फंदा लगाकर जान दी थी। पुलिस ने परिजनों को सूचना नहीं दी और हरिश्चंद्र घाट पर राजेंद्र का अंतिम संस्कार कर दिया।
इस मामले को राजेंद्र की पत्नी ने उठाया और मानवाधिकार आयोग से शिकायत दर्ज कराई। शासन ने भी मामले का संज्ञान लिया और जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई। जांच अधिकारी इंस्पेक्टर श्रीकांत पांडेय ने जांच की और मामले को साजिश करार दिया। रिपोर्ट में बताया कि राजेंद्र की मौत पुलिस अभिरक्षा में प्रताड़ना से हुई है।
जांच अधिकारी ने तत्कालीन लंका थानाध्यक्ष हसन अब्बास समेत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। मुकदमे के दौरान अवध मणि त्रिपाठी और कविंद्र नारायण सिंह को आरोपों से मुक्त कर दिया गया। वहीं कांस्टेबल श्रीनिवास शुक्ला और अनिरुद्ध यादव को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया।
अदालत ने गवाहों के बयान और उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर राधेश्याम सिंह, डॉ. केके जैन, और नरेंद्र प्रताप सिंह को दोषी करार दिया। साथ ही सजा सुना दी।