सुर तरु लता ते चारु फल ते फलित कीन्हों कामधेनधार राम नेह उपजावनी/किधो चिंतामनि की माला है विशाल कंठ करन बड़हि ये ही जोत उपजावनी/प्रभु की कहना श्री गुसाई की मधुर बानी मुक्तिदानी रसषान मन भावनी...। खांड़ को खिझावनीऔकं ह कौ कुढ़ावनी सी सीता को सतावनी औ सुह सकुचावनी..।
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अस्सी घाट पर संत तुलसी दास को अकबर की ओर से रहीम के हाथों भेजी गई स्वर्ण मुद्रा भेंट करने के प्रसंग में यह कवित्त रसखान ने लिखा है। कवि ब्रज जीवन ने अपनी कृति भक्तमाल में इसका उल्लेख किया है।
काशी में रामचरित मानस के अलावा कवितावली और विनय पत्रिका जैसी कृतियों को पूरा करने वाले महान संत तुलसी दास से अस्सी घाट पर बादशाह अकबर ने 1594 ई. में मुलाकात की थी। इसी के बाद सम्राट अकबर ने राम-सीय मुद्रा चलाई।
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इस मुद्रा की एक निशानी बीएचयू के भारत कला भवन में आज भी सहेज कर रखी गई है। अस्सी में गंगा तट पर संत तुलसी से सम्राट अकबर की मुलाकात के प्रमाण एक मुगलकालीन पेंटिंग से भी मिले हैं।
इस पेंटिंग में बादशाह अकबर लाव -लश्कर के साथ सजे-धजे बजड़े पर सवार दिखाया गया है। दूसरी ओर सुसज्जित बजड़े पर गोस्वामी तुलसी दास तीन शिष्यों के साथ दिखाए गए हैं।
अकबर ने जंगमबाड़ी मठ को दान दी थी जमीन
गंगा तट पर अकबर और तुलसी के मिलन की मुगलकालीन पेंटिंग
- फोटो : अमर उजाला
तुलसी साहित्य पर शोध करने वाले पांडुलिपि विशेषज्ञ पं. उदय शंकर दुबे का दावा है कि पेटिंग में संत तुलसी के साथ एक तरफ उनके मित्र राजा टोडरमल और दूसरी ओर उनके शिष्य मेघा भगत विराजमान हैं, जिन्होंने मानस के प्रचार के लिए रामलीलाओं का मंचन शुरू कराया था।
इस पेंटिंग में सम्राट के साथ शाही वेश में सजे-सजाए हाथी, घोड़े, सैनिक भी घाट पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। पेंटिंग उदयपुर में बनी होने की वजह से इस पर मेवाड़ और मुगल शैली दोनों का प्रभाव है। ऐतिहासिक शोध बताते हैं कि अकबर तीन बार काशी आया था।
पहली बार 1566 ई. में दूसरी बार 1569 ई. में कला मानिकपुर, इलाहाबाद, काशी , जौनपुर होते हुए आगरा गया था। तीसरी बाद 1569 में पटना जलमार्ग से होकर वह काशी आया था।
बीएचयू न्यूरोलॉजी विभाग के हेड प्रो. वीएन मिश्र ने एक शोध में जिक्र किया है कि अकबर ने 1566, 1585 में जंगमबाड़ी मठ के वीर मल्लिकार्जुन को जमीन दान से संबंधित तीन शासनादेश जारी किए थे। वह शासनादेश आज भी मठ में सुरक्षित हैं। इसी काल में अकबर ने संत तुलसी से काशी में मुलाकात की थी।
गोस्वामी तुलसी दास ने काशी में राम चरित मानस को गंगा के तट पर ही अपनी कुटिया में पूरा किया था। किष्किंधाकांड के आरंभ के दोहा से भी इसके प्रमाण मिलते हैं कि उन्होंने इस कांड की रचना काशी में ही की थी।
मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानिकर/जहं बस संभु-भवानि सो कासी सेइय कस न..। उदय शंकर दुबे बताते हैं कि काशी में तुलसी से मुलाकात के बाद अकबर राम भक्त हो गया था। उसने रहीम से स्वर्ण मुद्राएं तो तुलसी की कुटिया में भेजी ही, सीय-राम सिक्का भी चलाया था।
मुद्राशास्त्र में इसका विशिष्ट स्थान है। अलाउद्दीन खिलजी के समय उसके खजांची ठक्कुर फेरू ने अपने ग्रंथ द्रव्य परीक्षा और धातूत्पत्ति में राम सीय स्वर्ण मुद्रा की चर्चा की है। जो इस प्रकार है- कषय मय सीताराम दुविंह संजोय तह तिओंयं च/दह वन्नी दस मास अभन्नणीया सपूदवरा...।