ज्योतिषविद विमल जैन ने बताया कि होलिका दहन के लिए पहले से स्थापित की गई होलिका की विधि विधान से पूजा की जाती है। होलिका पूजन में रोली, अक्षत, पुष्प, साबुत हल्दी गांठ, नारियल, बताशा, कच्चा, सूत, गोबर के उपले और पूजन के अन्य सामग्री रहती है। होलिका दहन के समय होलिका की परिक्रमा करने का विधान है। होलिका की भस्म अत्यंत ही चमत्कारी मानी गई है।
ऐसी मान्यता है कि होलिका दहन के बाद सभी को होलिका की भस्म मस्तक पर लगानी चाहिए। जिससे आरोग्य लाभ के साथ सुख समृद्धि और खुशहाली में अभिवृद्धि होती है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को ही श्री चैतन्य महाप्रभु की जयंती भी मनाई जाती है।