रमजान का मुकद्दस महीना और उसकी रवायत आज भी कायम है। रमजान की सहरी में लोगों के जगाने के तरीके पहले जुदा थे। रोजेदारों को जगाने के लिए सड़कों पर काफिले निकलते थे, कव्वाली गाई जाती थी, हम्द व नात ए शरीफ पढ़ी जाती थी। जब बात इससे भी नहीं बनती तो ऐलान किया जाता कि सहरी का वक्त है रोजेदारों सहरी के लिए जाग जाओ शहर में तीन दशक पहले की रवायत अब पूरी तरह से गुम हो चुकी है। आधुनिकता के चलते अब न तो टोलियां रहीं और न ही रमजान में जगाने वाली पुरानी तकनीक। मस्जिदों से रोजेदारों को जगाने की यह रवायत तो आज भी कायम है मगर, रोजेदारों को जगाने वाली टोलियां अब बीते दिनों की बात हो गईं हैं। आज सेलफोन, आइपॉड से जहां अजान की आवाजें आ रही हैं वहीं इन्हीं तकनीक और साधन से सहरी में जगाने का सहारा ले रहे हैं।
शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि एक समय था जब रमजान शुरू होते ही देर रात घड़ी की सूइयां जब तीन बजे के करीब पहुंचती हैं तो रोजेदारों को जगाने के लिए टोलियां निकलती थीं। यही नहीं मस्जिदों से भी रोजेदारों को जगाने के लिए ऐलान होता, माइकों से आवाज आती, जनाब, नींद से बेदार हो जाइए, सहरी का वक्त हो चुका है। कहीं-कहीं ढोल व नगाड़े भी बजाए जाते थे और आवाज लगाकर रोजदारों को उठाने की कोशिश की जाती। रोजेदारों सहरी का वक्त हो गया है, सेहरी खा लो, हजरात, सिर्फ आधे घंटे बचे हैं जल्दी सेहरी से फारिग हो जाएं...। गौरीगंज के मरहूम सैयद नवाब अली को लोग आज भी याद करते हैं। सैयद नवाब अली ने न सिर्फ रमजान बल्कि हमेशा फजर की नमाज के लिए लोगों को जगाया करते थे।
आधुनिक तकनीक है जिम्मेदार
अर्दली बाजार के अमन बताते हैं कि रमजान में लोगों को जगाने वाली टोलियों जैसी बेहतरीन रवायत के गायब होने के पीछे आधुनिक तकनीक जिम्मेदार है। पहले जब समय जानने का कोई तरीका नहीं था तब सहरी के लिए जगाने वाले काफिले की अहमियत थी। लोगों को सोते से जगाने का यह एक अच्छा तरीका था लेकिन अब लाउडस्पीकर से ही मसजिद से जगाने भर से काम चल जाता है।