अधिवक्ता आचार्य श्यामजी उपाध्याय 45 साल से संस्कृत भाषा में वकालत कर रहे हैं। यहां तक कि उनका वकालतनामा, शपथ पत्र और प्रार्थना पत्र भी सबकुछ संस्कृत में ही होता है। 1978 में उन्होंने पहला केस लड़ा था और तब से आज तक लगातार इसी भाषा दलीलें देते हैं।
उनका कहना है कि न्यायाधीशों ने भी उन्हें सराहा और कभी भी उन्हें भाषा बदलने के लिए नहीं कहा। संस्कृत भाषा को आगे बढ़ाने के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें संस्कृत मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
अधिवक्ता श्यामजी उपाध्याय बताते हैं कि उनकी उम्र जब करीब 10 वर्ष थी। वह अपने पिताजी के साथ किसी काम कचहरी आए थे। वह संस्कृत के विद्धान थे।
कचहरी में उन्होंने अपने एक मित्र से कहा कि यहां कोई संस्कृत भाषा में काम नहीं करता है, यह कष्ट का विषय है। तभी मैंने सोच लिया कि अब संस्कृत का ही ज्ञान लूंगा और इसी भाषा में वकालत करूंगा। वह दावा करते हैं कि वह देश के इकलौते वकील हैं जो संस्कृत भाषा में मुकदमा लड़ रहे हैं।
1978 से अब तक उन्होंने हजारों मुकदमें लड़े, इसमें हत्या, डकैती और बलात्कार समेत कई धाराओं के मुकदमें रहे और सभी में विजय प्राप्त की। कहते हैं कि शुरु में हाल यह था कि जज के सामने अपनी बात रखना शुरु करते थे तो वह आश्चर्य में पड़ जाते थे।
वह उनसे सामान्य संवाद भी संस्कृत भाषा में करते थे, उन्होंने इस भाषा का सरलीकरण भी किया है। कहा कि कई बार न्यायधीशों ने कुछ समझना चाहा और उनके पास अनुवादक नहीं हुआ तो उन्होंने खुद भी हिंदी में अनुवाद कर उन्हें समझाया।