श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में गठित न्यास परिषद के नामित सदस्यों के कई प्रमुख पद सात माह से खाली हैं। ऐसे में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए अधिग्रहण के साथ ही बनाई गई व्यवस्था दिक्कत में है। काशी विश्वनाथ मंदिर विस्तारीकरण व सुंदरीकरण के दौर में तमाम फैसले सिर्फ न्यास अध्यक्ष व अधिकारियों के ही जिम्मे हैं।
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर का यूपी शासन ने 1983 में अधिग्रहण करने के साथ दो इकाइयों का गठन किया था। इसमें पूजन-परंपरा की निगरानी समेत निर्णय लेने के लिए विधायी संस्था के तौर पर श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद बनाया गया। इसमें श्रृंगेरी शंकराचार्य व संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति के साथ ही वित्त, कानून एवं विधि परामर्शी, धर्मार्थ, संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव, मंडलायुक्त, जिलाधिकारी और सीईओ को मानद सदस्य बनाया गया। साथ ही पांच विद्वानों को बतौर सदस्य तीन-तीन वर्ष के लिए नामित करने का प्रावधान किया गया।
इन मानद सदस्यों में श्रृंगेरी शंकराचार्य की ओर से पहले प्रतिनिधि भेजे जाते थे मगर वर्षो से उन्होंने यह औपचारिकता भी बंद कर दी। प्रमुख सचिवों में भी यदा-कदा ही किसी अधिकारी का बैठकों में आना होता है। इसकी खानापूर्ति किसी भी स्थानीय अधिकारी को बतौर प्रतिनिधि भेज कर ली जाती है।मंदिर न्यास परिषद अध्यक्ष आचार्य पंडित अशोक द्विवेदी ने कहा कि सदस्यों का चयन शासन द्वारा होता है। इसके लिए नाम मांगा जाता हो जो भेजा जाता है।