याद है न पिछले बरस जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में हुई बाढ़ त्रासदी की, वहां कश्मीरियों ने भी झेलम के साथ ऐसा ही कुछ किया था, जैसा कि काशी में वरुणा के साथ हो रहा है, नतीजा भीषण बाढ़ विभीषिका का सामना करना पड़ा था और सरकार के छक्के छूट गए थे। तो अगर प्रशासन ऐसी ही कुंभकर्णी नींद में सोया रहा तो इसका खामियाजा यहां के लोगों को भी भुगतना पड़ सकता है। हालांकि मंगलवार को मंडलायुक्त नितिन रमेश्ा गोकर्ण ने इस मामले को संज्ञान में लेने के साथ ही वरुणा में नालों के गिरने से रोकने की कार्ययोजना मांगी है।
वरुणा कॉरिडोर को विकसित करने की राह में अतिक्रमण सबसे बड़ा रोड़ा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का ड्रीम प्रोजेक्ट होने के बावजूद प्रशासनिक मशीनरी की कार्यप्रणाली ऐसी कि इस प्रोजेक्ट के मूर्तरूप लेने पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं। अतिक्रमण बिना हटाए नदी में ड्रेजिंग कराने पर जानकार सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि पहले नदी के बहाव क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कराया जाना चाहिए। हालात ऐसे हैं कि नदी की तलहटी तक घुसकर निर्माण कराए गए हैं।
नदी क्षेत्र में कराए गए अवैध निर्माणों में कई रिहायशी भवन और होटल भी हैं। आश्चर्य यह है कि पर्यटन के लिहाज से वरुणा कॉरिडोर को विकसित करने की कार्ययोजना तो तैयार कर ली गई लेकिन अतिक्रमण के मसले पर प्रशासन और संबंधित विभाग अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। अलबत्ता, खानापूर्ति के तौर पर वीडीए ने छह भवन स्वामियों को नोटिस जरूर भेजा है। जबकि, अतिक्रमण से न सिर्फ कॉरिडोर की योजना को पलीता लगेगा बल्कि इसका खामियाजा पूरे शहर को भुगतना पड़ेगा। नदी का बहाव प्रभावित होने से अब भी बारिश के मौसम में बाढ़ से दर्जनों बस्तियां डूब जाती हैं। आने वाले दिनों में यह संकट और बढ़ जाएगा।
काशी की पहचान से जुड़ी वरुणा की बदहाली प्रशासन और संबंधित विभागों की अनदेखी का ही नतीजा है। एक के बाद एक अवैध निर्माण कराए जाते रहे और जिम्मेदारों ने आंखें खोलने की जरूरत नहीं समझी। नतीजा यह हुआ कि नदी के पेटे तक तमाम निर्माण करा लिए गए। इससे नदी का बहाव तो प्रभावित हुआ ही, उसका दायरा भी सिमटता गया। फिलहाल तकरीबन दो सौ से अधिक ऐसे भवन हैं जो नदी के पेटे में बनाए गए हैं। जिलाधिकारी आवास के पीछे से लेकर सरायमोहाना तक अवैध निर्माणों का यह जाल फैला हुआ है। अतिक्रमण कर कुछ होटलों का भी निर्माण किया गया है।