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कैसे पीले करें बेटियों के हाथ

Wed, 13 Apr 2016 01:58 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला वाराणसी
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अपना आशियाना हर परिवार का सपना होता है। इसको साकार करने में कई लोगों की पूरी जिंदगी गुजर जाती है। यह सपना जब टूटता है तो आवाज सुनाई नहीं देती लेकिन दर्द कभी न मिटने वाले निशान छोड़ जाता है। कुछ ऐसा ही हाल रिंग रोड के विस्थापितों का है। अपना घर, जमी-जमाई गृहस्थी। अभी कुछ दिनों पहले तक सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन फिर एक झटके में सब कुछ जैसे डंवाडोल हो गया। रिंग रोड बनाने के लिए आशियाने ढहा दिए गए। इन आशियानों के साथ ही जैसे प्रभावित परिवारों के दिलों के अरमान भी टूट गए। गुजर-बसर के लिए किसी ने टिन शेड का छज्जा तो किसी ने मिट्टी का कच्चा घर बनाया। इससे परिवार को सिर ढकने की छाया तो मिल गई लेकिन रहने लायक घर न होने और आर्थिक तंगी के चलते अब इन प्रभावित परिवारों के घरों में शहनाई की गूंज रूठ गई है। बेटे-बेटियों के हाथ पीले नहीं हो पा रहे हैं। पास में पैसे नहीं कि वे बेटियों की शादी के लिए कोई रिश्ता तय कर पाएं और बेटों के लिए जो रिश्ते आ रहे हैं तो वे बंजारों की तरह अस्थाई घरों और परिवारों की खस्ताहाली देखकर बैरंग लौट जा रहे हैं।
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विकास जरूरी है, ऐसा यह किसान परिवार भी मानते हैं लेकिन पुनर्वास की अनदेखी के चलते उन्हें अब हर कदम मुश्किलों से जूझना पड़ रहा है। हरहुआ से संदहा तक निर्माणाधीन रिंग रोड के बगल में, मिट्टी के गारे के सहारे खड़ी दीवार और टीन शेड से बने कई अस्थाई मकान देखे जा सकते हैं। यह वही परिवार हैं जिनके घर भू अधिग्रहण के बाद गिरा दिए गए। रिंग रोड के लिए अधिगृहीत भूमि खाली कराने के दौरान कई घर टूटे।


28 गांवों के लगभग 100 किसान परिवार बेघर हुए। कुछ ने अपने ध्वस्त मकानों से निकली ईंटों के सहारे दीवार जोड़कर अस्थाई निवास बनाया तो कुछ ने मिट्टी दीवार खड़ी की और टिनशेड का छाजन कर अपने गुजारे की व्यवस्था की लेकिन हालात ऐसे कि दर्द छिपाने नहीं छिपता। यहां की धन्नो देवी बताती हैं कि उनकी बिटिया की शादी तय हुई थी पर घर न होने की वजह सेे वह टूट गई। इसी प्रकार चंद्रमा कुमार के पुत्रों की शादी इसलिए नहीं हो पा रही है कि उनके पास रहने के लिए कोई स्थाई मकान नहीं है। आधा-अधूरा मुआवजा मिलने के कारण आज तक दूसरा घर नहीं बन पाया। मिठाई लाल, राम सुंदर पाल, मुन्ना लाल, राम रतन जैसे कई लोग अस्थाई मकानों में रह रहे हैं। उन्हाेंने बताया कि लाख मिन्नतों के बाद भी उन्हें अपना अलग आशियाना बनाने तक की मोहलत नहीं दी गई। बुल्डोजर उनके आशियाने को ढहाता रहा और वे फरियाद करते रहे लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों ने उनकी सुनीं। उल्टे उन्हें धमकाया कि विरोध करोगे तो घर तोड़ने का खर्च भी वसूलेंगे। इसके बाद उनके लिए अपने जीवन भर के सपने को ढहते हुए देखने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था।
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