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कविता से किया धार्मिक उन्माद पर चोट

Sun, 28 Feb 2016 02:11 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला वाराणसी
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जन कवि आलोक धन्वा ने शनिवार को बीएचयू में दो दिनी युवा कवि संगम के समापन पर इराक पर पहली बार हुए हमले से लेकर अमानवीय समाज और औरतों की पीड़ा को कविताओं में व्यक्त किया। उन्होंने कविता के मर्म से लोगों को जोड़ने की कोशिश की। साथ ही नई पीढ़ी के रचनाकारों को संदेश भी दिया। कहा कि कविता के लिए गहन मानव संसर्ग में उतरना होगा। उन्होंने कहा कि धरती की आहट को कान लगाकर सुनने वाला कवि ही समाज को कुछ दे सकता है।
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शिक्षकों, छात्र-छात्राओं से खचाखच भरे बीएचयू के राधा कृष्णन सभागार में आलोक धन्वा ने बनारस से जुड़े संस्मरण भी सुनाए। भीड़ में कुछ चेहरों को उनकी आंखें तलाशती रहीं। उन्होंने कुछ समीक्षकों, कवियों के नाम भी लिए। इस दौरान उन्होंने पहली बार इराक हमले पर लिखी अपनी कविता ‘सफेद रात’ के बाद ‘भागी हुई लड़कियां’ और ‘जिलाधीश’ की पंक्तियां पढ़ीं।

स्त्री की स्मृतियों पर आधारित उनकी पंक्तियां इस तरह थीं- अब उसे याद करोगे /तो वह याद आएगी/ अब तुम्हारी याद ही उसका बगदाद है/ तुम्हारी याद ही उसकी गली, उसकी उम्र है/ उसका फिरोजी रुमाल है...। इसी कविता में वह आगे पढ़ते हैं कि- इलाहाबाद में बहुत कम बच रहा है इलाहाबाद/लखनऊ में बहुत कम बनारस/इन शहरों में हिंसा की ताकत/हिंसा की तैयारी है...। उनकी कविताओं पर सभागार में तालियों का शोर गूंजता रहा।
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इनसे पहले राजेश जोशी ने अपनी कविताओं से धार्मिक उन्माद पर चोट की। उनकी पंक्तियां थीं- जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएंगे/धर्म की ध्वजा उठाए/जो नहीं जाएंगे जुलस में/गोलियां भून डालेंगी उन्हें...। इनके अलावा सिद्धांत मोहन तिवारी, अविनाश मिश्र, सुधांशु फिरदौस, केशव तिवारी और राकेश रंजन ने भी कविताएं पढ़ीं। संचालन विहाग वैभव तो संयोजन डॉ. रामाज्ञा राय और प्रो. श्रद्धा सिंह का था।
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