लहरतारा प्राकट्य स्थल पर कबीर पंथियों का रेला उमड़ने से रविवार को मेले जैसा दृश्य रहा। कबीर जयंती महोत्सव के रंग में लहरतारा का हर कोना रंगा था। कहीं समूहों में संत झूमते-नाचते रहे तो कहीं सबद की गूंज सुनाई देती रही। सुबह गाजे-बाजे के साथ निकाली गई शोभायात्रा में कबीरपंथियों का तांता लग गया। लंबी कतार में कबीरपंथी सड़कों पर निकले तो जाम लग गया। शाम को चौका-आरती के साथ संत और अनुयायी विदा होने लगे।
श्रम-कर्म के संदेश से दुनिया को समाज सुधार का पाठ पढ़ाने वाले संत कबीर की जयंती पर तीन दिवसीय महोत्सव के आखिरी दिन रविवार को दीक्षा देने के साथ ही सत्संग का दौर चला। सुबह आठ बजे प्राकट्य स्थल से शोभायात्रा निकाली गई। इसमें महंत अर्धनाम साहेब एक रथ पर विराजमान थे। उनके पीछे देश के कोने-कोने से आए भक्तों का कारवां निकला। लहरतारा, बौलिया से होते हुए शोभायात्रा पुन: प्राकट्यस्थल पहुंची। वहां हुए सत्संग में संत अर्धनाम साहेब ने कहा कि जाति, धर्म और कर्मकांड के पाखंड से जब तक मानव अलग नहीं होगा, तब तक उसे भटकना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि कबीर ने समाज को मानवता के सूत्र में पिरोने का काम किया था। इस दौर में भी तमाम लोग पाखंड और आडंबर फैलाकर समाज के साथ छल कर रहे हैं। इससे बचने की जरूरत है। धर्माधिकारी सुधाकर शास्त्री के अलावा महंत प्रेमदास साहेब, अंकित दास, नितिन भाई, सुनील दास शास्त्री, महंत सुमिरन दास, महंत मनभंग दास, महंत राजेंद्र आदि संतों ने विचार व्यक्त किए।