संस्कृत शास्त्रों के प्रचार प्रसार के लिए आधुनिक पद्धति से अध्यापन कराने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शास्त्र में निहित ज्ञान और विज्ञान आज भी संधि और समासों के नियमों से आबद्ध होने के कारण अति जटिल है। शास्त्र में निहित नियमों का संरक्षण करते हुए अध्ययन अध्यापन कराने की आवश्यकता है किंतु यह भी ध्यान हो कि इसमें सुगमता कैसे आ सकती है?
उक्त बातें प्रो. हीरककांति चक्रवर्ती ने कहीं। वह बृहस्पतिवार को संस्कृत विद्या विभाग में शास्त्र के अध्ययन में नवाचार विषयक संगोष्ठी काे संबोधित कर रहे थे। इटली की डॉ. एंतोलेना ने बताया कि अन्य भाषाओं में वर्णों के उच्चारण से संबंधित प्रक्रियाओं पर विचार नहीं के बराबर हैं। प्रो. शैलेश कुमार मिश्र ने कहा कि नई शिक्षा नीति के क्रम में प्राचीन शास्त्रों का अध्ययन अध्यापन के लिए टीकाओं की अपेक्षा पहले मूल ग्रंथ का पठन पाठन आवश्यक है। यह भी ध्यान रहे की व्याकरण पढ़ते समय सूत्रों को पढ़ाने की अपेक्षा सरल भाषा में उनके आशय को पहले पढ़ाया जाए।
डॉ. रविशंकर पांडेय ने व्याकरण के सूत्रों तथा उनके लक्षण पर विशेष प्रकाश डालते हुए बताया कि छात्रों की बौद्धिक क्षमता का आंकलन करते हुए पारिभाषिक शब्द मुक्त सहज शब्दों में सूत्रों के अध्ययन अध्यापन की आवश्यकता है। आजकल के पाठ्यक्रम सेमेस्टर वार विभाजित होने के कारण पाठ्यक्रमों को व्यवस्थित रूप से पढ़ाने की प्रक्रिया में परिवर्तन की आवश्यकता है। संगोष्ठी का संचालन डॉ. बालेश्वर झा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन छात्र शिवम मौर्य ने किया।