बीएचयू के मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र के महामना सभागार में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की 1903 में लिखी गई कहानी ‘ग्यारह वर्ष का समय’ नाटक का मंचन किया गया। अभिनय में पति अपनी पत्नी को 11 साल तक ढूंढता रहा। अंत में काशी में वह मिलती है। पत्नी का चेहरा याद नहीं आया तो नायक एक काले तिल के निशान से पहचानता है। इस दौरान सभागार को पुरानी वस्तुओं और लाइटों के माध्यम से 1900 के समय जैसा बनाया गया था। इस नाटक का आयोजन अंतर सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र और रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान के द्वारा किया गया। इस कहानी का नाट्य रूपांंतरण और मंच परिकल्पना प्रो. मंजीत चतुर्वेदी और नाटक का निर्देशन उमेश भाटिया ने किया।