हिंदी को अदालती भाषा बनाने का भारतेंदु हरिश्चंद्र का सपना 140 साल बाद भी अधूरा ही है। भारतेंदु बाबू ने वर्ष 1882 में तत्कालीन शिक्षा आयोग हंटर कमीशन के समक्ष इसको लेकर जोरदार पैरवी की थी। कमीशन के सामने अपनी गवाही में कहा था यदि हिंदी अदालती भाषा हो जाए, तो समन पढ़वाने के लिए दो-चार आने कौन देगा और साधारण सी अर्जी लिखवाने के लिए कोई रुपया-आठ आने क्यों देगा। तब पढ़ने वालों को यह अवसर कहां मिलेगा कि गवाही के समन को गिरफ्तारी का वारंट बता दें।
नवगीतकार सुरेंद्र वाजपेयी ने बताया कि निज भाषा उन्नति अहै...का मूलमंत्र देने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म नौ सितंबर 1850 को चौखंभा में हुआ था। भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी भाषा के उन्नायक के साथ भारतीयता और सनातन संस्कृति से भी ओतप्रोत थे। देश से गोवध समाप्त करने के लिए 1877 में साठ हजार हस्ताक्षर कराकर लार्ड लिटन को भेजा था। वे हस्ताक्षर अभियान के प्रणेता हैं ।