इतिहास और कानून की स्केल पर पूरे 30 साल बाद। लोग उस रास्ते से गुजरने लगे जहां अब तक पाबंदियां होती थीं। उनमें से कुछ तो ये भी नहीं जानते थे कि वो जिस विग्रह और तहखाने के आगे हाथ जोड़ रहे हैं वो है क्या…। उनके लिए वो सिर्फ भगवान थे। और जो जानते थे वो खुश थे, ये सोचकर कि अपने नाती-पोतों को बताएंगे, ज्ञानवापी में तहखाने के जब पहले दर्शन खुले तो वो वहां थे। वहां जितने दर्शन करने वाले थे उतने ही पुलिस वाले भी।
इसी तहखाने के ठीक ऊपर नमाज अदा करने वाले जुट रहे थे। पहले एक। दो। चार-पांच फिर अचानक कुछ दर्जन। वो तमाम लोग नीचे तहखाने के सामने से दर्शन को गुजर रहे लोगों को हैरत से देख रहे थे। उनकी नजरें बातें कर रही थीं। जिसे मस्जिद कहते थे उसके नीचे मंदिर है ये देखकर वो हैरान थे। ये एएसआई का सच है जो उन्हें कुबूल नहीं। बीच में लोहे के बैरिकेड थे। समय की गवाही देते बैरिकेड।
इतिहास की भी अजीब बिसात है। ये पिछले 48 घंटों में परतों में खुल रहा है। पहले कोर्ट का केस। दलीलें। आदेश। फिर पूजा और दर्शन। वहां बुलेटप्रूफ जैकेट और पटका पहने, सिक्योरिटी फोर्स के जवान नंगे पैर ड्यूटी दे रहे हैं। पुलिसवालों के माथे पर बाबा की भभूत है। आस्था का अपना प्रोटोकॉल है। बाहर आते-आते एक श्रद्धालु कहते हैं नंदी का तप है - रास्ता खुल रहा है। देश के धार्मिक कैनवास पर रामधुन अभी सोलह कलाओं से काबिज भी नहीं हुई थी कि महादेव की नगरी काशी में इतिहास का तहखाना खुल गया है।