गंगा के बीच में टीले उभरने की वजह से गंगा के दोनों किनारों पर कटान स्थानीय लोगों की मुश्किलें बढ़ा देती है। प्रो. चौधरी कहते हैं कि इन सभी समस्याओं से बाहर निकलना है तो गंगा में पानी का प्रवाह बढ़ाना होगा। गंगा में पानी प्रवाह बढ़ेगा तो गंगा खुद इन सभी समस्याओं को दूर कर देगी।
गंगा को समझिए पेट और टीले को पथरी
प्रो. चौधरी गंगा में बन रहे रेत के टीलों को पेट में पथरी की समस्या के रूप में समझाते हैं। कहते हैं कि पथरी जिस तरह हमारे पाचन क्रिया को विभिन्न रूपों से प्रभावित करते हैं, उसी तरह गंगा में टीले नदी की शक्ति खत्म करते हैं।
पेट में पथरी कहां स्थित है, पथरी की अधिकतम मात्रा कितनी है, यह पेट की सारे समस्याओं को परिभाषित करता है। उसी प्रकार बालू-क्षेत्र की ऊंचाई सबसे ज्यादा कहां है और बालू कितनी है, यह नदी-समस्या का वर्णन करती है। नदी की अनुप्रवाह लंबाई बढ़ने के साथ बाढ़ की समस्या गंभीर हो जाती है। नदी की वक्रता बढ़ जाती है।
बड़ा हो जाता है बाढ़ का मैदान और बेसिन क्षेत्र
उन्होंने बताया कि इससे बाढ़ का मैदान और बेसिन क्षेत्र बड़ा हो जाता है। बाढ़ प्राकृतिक आपदा नहीं है। पथरी का जमाव जितना ज्यादा बढ़ेगा, शरीर की कोशिकाएं टूटेंगी। इसी तरह नदी के पेट (उन्नत्तोदर किनारे) में बालू जितनी ज्यादा मात्रा में जमा होता जाएगा, नदी का वेग उसी अनुपात में नतोदर किनारे की ओर बढ़ेगा, किनारे की मिट्टी कटेगी और वक्रता बढ़ेगी। वह यह भी कहते हैं कि एसटीपी से गंगा प्रदूषण को दूर नहीं किया जा सकता है, बल्कि यह प्रदूषण को बढ़ाता है।