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Subhash Chandra Bose Jayanti 2022: बनारस में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का मंदिर, क्रांति से शांति की ओर चलकर शक्ति की पूजा का भाव

Sun, 23 Jan 2022 01:28 AM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

दुनिया भर के भारतवंशियों और नेताजी के चाहने वालों की आस्था का केंद्र वाराणसी के लमही में स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस का मंदिर है। विश्व का इकलौता मंदिर जहां कपाट भारत माता की प्रार्थना से खुलते हैं और सुभाष आरती के बाद कपाट बंद होते हैं। 
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वाराणसी के लमही स्थित सुभाष मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस का देश में पहला मंदिर बनारस में ही है। लमही स्थित सुभाष भवन में 123वीं जयंती पर मंदिर का उद्घाटन हुआ था। मंदिर में लगाई गई 11 फीट ऊंची छतरी के नीचे नेताजी की छह फीट की प्रतिमा स्थापित की गई है। क्रांति से शांति की ओर चलकर शक्ति की पूजा के भाव के साथ मंदिर में रोजाना पूजन किया जा रहा है।

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मंदिर की स्थापना करने वाले विशाल भारत संस्थान के संस्थापक प्रो. राजीव श्रीवास्तव ने बताया कि मंदिर की स्थापना के पीछे लोगों के मन में देशप्रेम का भाव जागृत करना है। मंदिर की बनावट थोड़ी अलग है। सीढ़ियां लाल रंग की, चबूतरा सफेद पत्थर का और मूर्ति काले रंग की है।

लाल रंग क्रांति का, सफेद शांति और काला शक्ति का प्रतीक है। क्रांति से शांति की ओर चलकर शक्ति की पूजा करने का उद्देश्य है। रोज सुबह सात बजे आरती कर भारत माता की प्रार्थना के साथ मंदिर का पट खुलता है और शाम को सात बजे आरती के बाद बंद कर दिया जाता है।  
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आजाद हिंद सरकार का राष्ट्रगान

बताया कि छुआछूत, धर्म, जाति, रंग, लिंग, भाषा के भेद को खत्म करने, सांप्रदायिक एकता स्थापित करने एवं देशभक्ति का पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से की थी। महिलाएं, पुरुष, किन्नर सभी यहां पर दर्शन करने आते हैं। सुभाष मंदिर सुबह 7 बजे भारत माता की प्रार्थना के साथ खुलता है और शाम 7 बजे से पहले आजाद हिंद सरकार का राष्ट्रगान गाया जाता है। फिर पांच बार राष्ट्रदेवता को जय हिंद के साथ सलामी दी जाती है, बाद में महाआरती होती है। 

काशी की गुप्त यात्रा पर कई बार आए थे नेताजी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस - फोटो : Social media
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का काशी से गहरा नाता थे। नेताजी के मौसी और मौसा बंगाली ड्योढ़ी में रहते थे। उनके मौसा बैरिस्टर थे। नेताजी जी कई बार काशी की गुप्त यात्रा पर आए थे और काशी को लेकर उनके दिलो-दिमाग में कई योजनाएं थीं। बीएचयू के भारत कला भवन में नेताजी से जुड़ी कई स्मृतियां आज भी संग्रहीत हैं।

नेताजी के मौसी के प्रपौत्र वीरभद्र मित्रा ने बताया कि नेताजी का नारा था इत्तहाद, एकता, ऐतमाद, विश्वास, इतिमिदाद और बलिदान। उन्होंने गांधीजी को राष्ट्रपिता का संबोधन दिया था। वह बहुत दूरदर्शी थी थे एक पत्र में जिक्र  मिलता है कि नेताजी ने गांधी जी से कहा था कि आप बंटवारे की बात मत मानिए नहीं तो आने वाले समय में इसी आधार पर सिखिस्तान, गढ़वालिस्तान की मांग उठने लगेगी।

वीरभद्र मित्रा ने बताया कि भारत कला भवन में आजाद हिंद फौज का रुपया, मालवीय जी को नेताजी द्वारा लिखा हुआ पत्र संग्रहित करके रखा गया है। वीरभद्र मित्रा ने बताया कि नेताजी दो बार बंगाली ड्योढ़ी आए थे और बेहद गोपनीय तरीके से दो दिन निवास किया और फिर चले गए। काशी में वह कई बार गोपनीय तरीके से आए थे। बहुत कम लोगों को पता है कि नेताजी की बहन उर्मिला देवी की शादी गोरखपुर के राय परिवार में हुई थी। नेताजी के बहनोई चिकित्सक थे।
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बुनकरों को देना चाहते थे बिजली

नेताजी के दिमाग में काशी के लिए कई सारी योजनाएं थीं। उस दौर में वे बनारस के बुनकरों को बिजली उपलब्ध कराना चाहते थे। उनका कहना था कि यदि बनारस के बुनकरों को बिजली उपलब्ध कराई जाए तो हम मैनचेस्टर को वस्त्र निर्यात कर सकते हैं। उनका कहना था कि हर देश अपना हित चाहता है और हमें अपने हितों के अनुसार काम करना होगा।
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