वाराणसी। अस्सी घाट पर शनिवार को पूरब की लाली निखरने का इंतजार हर आंख में दिखा। शास्त्रीय संगीत के बनारस घराने में सुबह के रागों से मोहब्बत का यह रंग विश्व पटल पर अलग रिकार्ड बनाने के लिए तैयार सुबह-ए-बनारस की महफिल पर खूब जमा। रोज नए कलाकारों के साथ संगीत के इस सफर के 111 दिन पूरे होने पर राग ललित के साथ हुई सुबह को काशीवासियों ने ही नहीं, विदेशी मेहमानों ने भी सराहा। सितार के तारों पर दादरा की बंदिश झंकृत हुई तो ठुमरी गायक पं.छन्नूलाल से नहीं रहा गया और वे मंच पर पहुंचे। हर-हर महादेव के जयकारे गूंजने लगे और गुुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा होने लगी।
यज्ञकुंड में आहुति और फिर पतित पावनी गंगा की आरती से सुबह-ए-बनारस के इस सफरनामे को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया गया। शुरुआत हुई चंद्रकांत की शहनाई से। तबले पर संगत की कैलाश ने। इनके बाद पं. देवव्रत मिश्र ने राग बनारस के गायकी अंग के भावों को सितार पर बजाया। वे होरी बजाने जा रहे थे, तभी डीएम के
आग्रह पर दीर्घा में मौजूद पं. छन्नूलाल मिश्र ने माइक संभाल लिया। उन्होंने जय दुर्गे जगदंब भवानी... को पहले राग में निबद्ध किया और फिर पारंपरिक भजन के अंदाज में ले गए। इसके बाद चैती उन्होंने पेश की। सेजिया से सइयां उठि गइलें हो रामा... कोयल तोरि बोलिया...। फिर उन्होंने खेलें मशाने में होरी दिगंबर... पेश कर विराम लिया। मंडलायुक्त आरएम श्रीवास्तव, डीएम प्रांजल यादव, प्रो. काशीनाथ सिंह, सीडीओ विशाख जी, क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी रवींद्र मिश्र समेत तमाम अफसर और संगीत प्रेमी उपस्थित थे। आभार जताया क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा ने।
सफर के सारथियों का सम्मान
वाराणसी। अस्सी घाट पर महफिल का 111 दिन का सफर तय करने में सहयोग करने वाले कलाकारों और जिला सांस्कृतिक समिति के सदस्यों को सम्मानित किया गया। डॉ. राजेश्वर आचार्य, अमिताभ भट्टाचार्य, देवाशीष डे, अवनी धर, प्रवीण पांडेय, श्रीनिवास तिवारी समेत अन्य सहयोगियों को अंगवस्त्रम और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।