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अजब-गजब: सैकड़ों वर्ष पुराना यह पेड़ है भूतों का अड्डा, बचने के लिए लोग करते हैं ऐसी पूजा

Sun, 07 Aug 2022 03:43 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

सोनभद्र के कड़िया सन्नाइत मंदिर के पास सैकड़ों वर्ष पुराना चिलबिल का पेड़ है। पेड़ के नीचे एक मूर्ति भी है, जिसे कड़िया डीह देवता की मूर्ति मानी जाती है। 
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कड़िया सन्नाइत मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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एक तरफ हम चांद पर जाने की तैयारी कर रहे हैं तो दूसरी ओर आज भी बड़ी तादाद में ग्रामीण आबादी अंधविश्वास में जकड़ी हुई है। भूत-प्रेत और जादू-टोने को लेकर इनकी मान्यताएं इतनी गहरी हैं कि वह बकायदे इससे बचने के लिए तरह-तरह के यत्न भी करते हैं। आदिवासी बहुल सोनभद्र जिले में इसके कई उदाहरण हैं।

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कड़िया सन्नाइत मंदिर पर इसकी बानगी देखी जा सकती है। इस मंदिर के पास स्थित एक पुराने पेड़ पर लोगों ने सैकड़ों कील और सिक्का बांध कर रखा है। उनका मानना है कि कील और सिक्के में उन्होंने भूत बांधकर रखा है। ओझा के कहने पर लोग ऐसा करते हैं।

यह मंदिर घोरावल तहसील क्षेत्र के मुक्खा गांव में है। यहां सैकड़ों वर्ष पुराना चिलबिल का पेड़ है। पेड़ के नीचे एक मूर्ति भी है, जिसे कड़िया डीह देवता की मूर्ति मानी जाती है। ग्रामीण इन्हें भूत प्रेत पिशाच का नियंत्रक देवता माना जाता है। पहले यह मूर्ति पेड़ के नीचे खुले में थी। बाद में लोगों ने आपसी सहयोग से एक मंदिर बनवाकर कड़िया डीह बाबा की मूर्ति उसमें रख दी।

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यहां एक पुजारी भी रहते हैं, जो कथित रूप से भूत प्रेतों को बैठाने का काम करते हैं। मुक्खा गांव के निवासी कौशल किशोर मिश्रा इसके बारे में बताते हैं कि उनके दादा परदादा भी कड़िया सन्नाइत डीह बाबा व चिलबिल के वृक्ष की चर्चा करते थे।उन्होंने बताया कि कड़िया सन्नाइत डीह बाबा के स्थान पर भूत प्रेत से पीड़ित लोग बड़ी संख्या में आते हैं।

इसी पेड़ की लोग करते हैं पूजा - फोटो : अमर उजाला
उनके साथ आने वाले ओझा, सोखा या स्थानीय पुजारी डीह बाबा की पूजा करते हैं। चढ़ावे के रूप में मुर्गा, बकरा, दारू व विभिन्न भोज्य पदार्थ चढ़ाए जाते हैं। यहां आकर पीड़ित व्यक्ति या महिला के भूत प्रेत जमकर हबुआते व खेलते हैं। अपना नाम-पता बताते हैं। इसके बाद चिलबिल के पेड़ में सिक्का व कील ठोंककर पेड़ में भूत प्रेत को बांध दिया जाता है।

कुछ ओझा पेड़ में नारियल चुनरी भी बांधते हैं। नवरात्र व पितृपक्ष के समय यहां सर्वाधिक भीड़ होती है और मेला लगा रहता है। पुराने लोग बताते हैं कि खास मौकों पर चिलबिल के पेड़ से निकलकर एक ज्योति आकाश मार्ग से पश्चिम दिशा में आधा किलोमीटर दूर एक बरगद वृक्ष के नीचे जाता था, वहीं विपरीत दिशा से आम के वृक्ष के नीचे गवहेर माता के मंदिर से एक ज्योति निकलकर आकाश मार्ग से बरगद वृक्ष के नीचे पहुंचता था, जहां दोनों ज्योतियों का मिलन होता था।
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कड़िया सन्नाइत के करीब एक किमी क्षेत्र में सदियों पुराने ठाकुर-ठकुराइन मंदिर, कौलेश्वरी देवी मंदिर में पूजा पद्धति देखकर व आसपास के इलाकों में मौजूद तांत्रिक मूर्तियों को देखकर प्रतीत होता है कि यह स्थान तंत्र साधना का केंद्र रहा है।
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