यहां एक पुजारी भी रहते हैं, जो कथित रूप से भूत प्रेतों को बैठाने का काम करते हैं। मुक्खा गांव के निवासी कौशल किशोर मिश्रा इसके बारे में बताते हैं कि उनके दादा परदादा भी कड़िया सन्नाइत डीह बाबा व चिलबिल के वृक्ष की चर्चा करते थे।उन्होंने बताया कि कड़िया सन्नाइत डीह बाबा के स्थान पर भूत प्रेत से पीड़ित लोग बड़ी संख्या में आते हैं।
इसी पेड़ की लोग करते हैं पूजा
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उनके साथ आने वाले ओझा, सोखा या स्थानीय पुजारी डीह बाबा की पूजा करते हैं। चढ़ावे के रूप में मुर्गा, बकरा, दारू व विभिन्न भोज्य पदार्थ चढ़ाए जाते हैं। यहां आकर पीड़ित व्यक्ति या महिला के भूत प्रेत जमकर हबुआते व खेलते हैं। अपना नाम-पता बताते हैं। इसके बाद चिलबिल के पेड़ में सिक्का व कील ठोंककर पेड़ में भूत प्रेत को बांध दिया जाता है।
कुछ ओझा पेड़ में नारियल चुनरी भी बांधते हैं। नवरात्र व पितृपक्ष के समय यहां सर्वाधिक भीड़ होती है और मेला लगा रहता है। पुराने लोग बताते हैं कि खास मौकों पर चिलबिल के पेड़ से निकलकर एक ज्योति आकाश मार्ग से पश्चिम दिशा में आधा किलोमीटर दूर एक बरगद वृक्ष के नीचे जाता था, वहीं विपरीत दिशा से आम के वृक्ष के नीचे गवहेर माता के मंदिर से एक ज्योति निकलकर आकाश मार्ग से बरगद वृक्ष के नीचे पहुंचता था, जहां दोनों ज्योतियों का मिलन होता था।
कड़िया सन्नाइत के करीब एक किमी क्षेत्र में सदियों पुराने ठाकुर-ठकुराइन मंदिर, कौलेश्वरी देवी मंदिर में पूजा पद्धति देखकर व आसपास के इलाकों में मौजूद तांत्रिक मूर्तियों को देखकर प्रतीत होता है कि यह स्थान तंत्र साधना का केंद्र रहा है।