हॉकी के उस्ताद मोहम्मद शाहिद व उनकी पत्नी परवीन शाहिद
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हॉकी के उस्ताद मोहम्मद शाहिद का जोश और जज्बा गजब का था। उनकी सुबह हॉकी स्टिक और बॉल की खटपट से होती थी। कुर्सी पर बैठकर ड्रिब्लिंग करते थे। मेहनत का यह सिलसिला घर से मैदान तक दिन रात जारी रहता था। कड़ी मेहनत से जीती उनकी ट्रॉफियां मकबूल आलम रोड पर उनके घर में चमचमा रही हैं। ओलंपिक में आठवें स्वर्ण पदक की चमक आज भी बरकरार है। पदकों की देखभाल मोहम्मद शाहिद की पत्नी परवीन शाहिद करती हैं। हॉकी वाराणसी के अध्यक्ष डॉ. एके सिंह ने बताया कि 44 साल पहले 29 जुलाई 1980 को मॉस्को ओलंपिक में स्पेन को 4-3 से हराकर भारत ने स्वर्ण पदक जीता। इसमें मोहम्मद शाहिद ने निर्णायक गोल किया था। इससे पहले 1976 कनाडा में भारतीय टीम सातवें स्थान पर रही थी।
परवीन शाहिद ने बताया कि प्रतिदिन पदकों की सफाई की जाती है। इन्हें साफ करने में तीन घंटे लगते हैं। बताया कि उनके पति ने बांस की छोटी सी हॉकी से खेलना शुरू किया था। उस समय छोटे साइज की हॉकी नहीं मिलती थी। पुलिसलाइन से शुरू हुआ उनका सफर तीन ओलंपिक तक चला।
पद्मश्री और अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित मोहम्मद शाहिद के असमय निधन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी यादों को संजोने का काम किया। उनकी स्मृति में हर साल ऑल इंडिया मोहम्मद शाहिद प्राइज मनी हॉकी प्रतियोगिता वाराणसी में होती है। लखनऊ में गोमती नगर में मोहम्मद शाहिद के नाम से हॉकी का आधुनिक स्टेडियम भी बन रहा है।