बीएचयू के इतिहासकार प्रो. अशोक सिंह का कहना है कि अब तो माइक्रो डेटिंग का जमाना है, अगर एक अनाज का दाना भी मिल गया तो उसकी डेटिंग से उसकी असली तारीख पता चल जाएगी। पहले भी प्रो. कृष्णनन ने सारनाथ का सर्वे किया था। सर्वे के जरिये देखने का प्रयास हुआ था कि जो स्ट्रक्चर दिख रहा है, उसके अतिरिक्त और क्या-क्या है? वर्तमान में जो कुछ दिख रहा है, उससे ज्यादा सारनाथ की जमीन के नीचे है। रडार सर्वे तकनीक के जरिये तीन से चार मीटर का सर्वे हुआ था। एएसआई के सामने रडार सर्वे के अलावा ट्रेंच लगाने का भी विकल्प है।
इतिहासकारों ने पहले ही प्रस्ताव दिया था कि ज्ञानवापी परिसर से 50 मीटर की दूरी में ट्रेंच लगाकर सर्वे किया जा सकता है। इससे पता चल जाएगा कि यह परिसर कितने पहले आबाद हुआ होगा? कौन सी बस्ती सबसे पहले बनी होगी? अभी तक जो अनुमान है, उसे तथ्यों के साथ कहा जा सकेगा। बभनियांव की खुदाई से पता चला कि शिवलिंग की परिकल्पना दो सौ एडी से शुरू हो गई। संभावना है कि यहां उससे भी प्राचीन तथ्य मिल सकते हैं। सर्वे से बहुत सारी तथ्यपरक चीजें स्पष्ट हो जाएंगी।
इतिहासकार के मुताबिक, पुरातात्विक सर्वे का मुख्य उद्देश्य है कि उक्त स्थल पर धार्मिक ढांचा किसी अन्य धार्मिक निर्माण पर तो नहीं बनाया गया है। पुरावशेष में क्या बदलाव किया गया है? यदि ऐसा है तो उसकी निश्चित अवधि, आकार, वास्तुशिल्पीय डिजाइन और बनावट विवादित स्थल पर वर्तमान में किस रूप में है? जांच में जीपीआर (ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार) अथवा जिओ रेडियोलॉजी सिस्टम अथवा दोनों का प्रयोग कर सर्वेक्षण कर सकती है।
प्रो अशोक सिंह के मुताबिक जीपीआर सर्वे की इस अत्याधुनिक तकनीक से बिना खोदाई कराए जमीन से 15 मीटर नीचे तक की सभी जानकारियां आसानी से मिल जाती हैं। काशी की प्राचीनता के लिहाज से यह बहुत जरूरी है कि खोदाई के समय क्षेत्र की सभ्यता का ध्यान रखा जाए। ऐसी महत्वपूर्ण जगहें भी होती हैं, जहां ऐतिहासिक धरोहरें दबी होती हैं। खोदाई में इनके नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है। एक किलोमीटर के जीपीआर सर्वे पर करीब दस हजार रुपये तक का खर्च आता है। इससे किसी तरह का उस क्षेत्र को कोई भी नुकसान नहीं होता है।
इतिहासकार ने बताया ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) एक भू-भौतिकीय विधि है, जो उपसतह की छवि के लिए रडार का उपयोग करती है। यह कंक्रीट, तारकोल, धातु, पाइप, केबल या चिनाई जैसी भूमिगत उपयोगिताओं की जांच करने के लिए उपसतह का सर्वेक्षण करने का एक तरीका है।
बनारस के विकास कार्यों के लिए वर्ष 2017 में सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया डॉ. स्वर्णा सुब्बाराव के निर्देशन में इसी तकनीक से सर्वे किया गया था। 2017 में देश में पहली बार बनारस में ही इस तकनीक से अंडर ग्राउंड मेट्रो के लिए सर्वे किया गया था। इसमें विद्यापीठ के तत्कालीन कुलपति प्रो. पी नाग भी थे।
एएसआई के अधीक्षण पुरातत्वविद अविनाश मोहंती ने बताया कि अभी कोर्ट का आर्डर नहीं आया है, आदेश मिलने के बाद ही इस मामले में कुछ कहा जा सकता है।