अगर आपको बैठे बैठे नींद लगने और खर्राटा भरने की समस्या है तो सतर्क होना बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए कि समय से इलाज हो तो इससे निजात मिल सकती है, नहीं तो आगे चलकर यह सेहत के लिए खतरनाक हो जाता है। चिकित्सकीय भाषा में इसे स्लीप एपनिया सिंड्रोम बोला जाता है।
पहले यह बीमारी 40 साल से ऊपर के लोगों को होती थी, लेकिन अब इससे नीचे के उम्र वाले लोग भी इसकी चपेट में आते जा रहे हैं। स्लीप एपनिया सिंड्रोम एक ऐसी बीमारी है, जिसका जुड़ाव शरीर के वजन से होता है। बीएचयू के टीबी एंड चेस्ट डिपार्टमेंट के अध्यक्ष प्रो. जीएन श्रीवास्तव का कहना है कि अगर शरीर का वजन अधिक है तो खून में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगती है। इसके साथ ही कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने लगती है। यहीं कारण है कि संबंधित व्यक्ति को नींद सी आनी लगती है। कभी कभी गाड़ी चलाते समय, घर या आफिस में बैठते समय झपकी आनी लगती है। डिपार्टमेंट में इस तरह की समस्या लेकर आने वाले मरीजों में अब 20 से 40 साल के लोग भी शामिल हैं। पहले 40 से अधिक उम्र वाले ही अधिकांश आते थे।
तेजी से कम होने लगता है ऑक्सीजन
स्लीप एपनिया सिंड्रोम की वजह से व्यक्ति के शरीर में ऑक्सीजन तेजी से कम होने लगता है। प्रो. जीएन श्रीवास्तव के अनुसार जिनका वजन अधिक रहता है, ऑक्सीजन की सप्लाई कम होने लगती है। स्वस्थ मनुष्य का ऑक्सीजन सेचुरेशन 90 या उससे अधिक होना चाहिए लेकिन स्लीप एपनिया से परेशान मरीजों का ऑक्सीजन सेचुरेशन 70 तक पहुंच जाता है।
रात भर चलता है इलाज
बीएचयू के टीबी एंड चेस्ट डिपार्टमेंट में बने स्लीप स्टडी रूम में स्लीप एपनिया से ग्रसित मरीजों का इलाज किया जाता है। यहां रात भर मरीज को भर्ती कर पहले जांच की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसमें नाइट विजन कैमरा की भूमिका बहुत अहम है। अलग-अलग कुल 52 पैरामीटर हैं, जिनके आधार पर मरीज का खर्राटा भरने, हृदय गति, आंख के मूवमेंट आदि को नापा जाता है।
क्या हैं लक्षण
आराम की स्थिति में नींद आना
काम करते करते झपकी आने की समस्या
लगातार वजन का बढ़ते रहना