श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार को है। कान्हा के उत्सव में देवाधिदेव श्रीकाशी विश्वनाथ स्वयं 33 कोटि देवी-देवताओं संग शामिल होते हैं और प्रभु के जन्मोत्सव का उत्सव मनाते हैं। कान्हा बृजधाम में राग, भोग और शृंगार से रिझाते हैं, मगर काशी में हर और हरि का स्वरूप दिखता है। भक्त अपनी प्रिय चीजें राग-भोग के साथ अर्पित करते हैं। शैव और वैष्णव दोनों आराधना में लीन होते हैं।
प्रभु श्रीकृष्ण की प्राकट्यस्थली मथुरा और भगवान शिव की नगरी काशी में भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर श्रद्धा और भक्ति का संगम दिखेगा। भागवत गीता के मर्मज्ञ व वैष्णव परंपरा के षष्ठपीठ गोपाल मंदिर के सेवक अशोक बल्लभदास ने बताया कि काशी के कण-कण में भगवान शंकर विराजमान हैं तो मथुरा के कण-कण में भगवान श्रीकृष्ण हैं।
वहां केवल राधा-कृष्ण का महिमागान होता है, लेकिन काशी में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर भगवान शिव अपने गणों के साथ शामिल होकर हर्ष मनाते हैं। वहां कान्हा के स्वरूप में सेवा होती है, जबकि काशी में मूर्ति और स्वरूप दोनों रूपों में सेवा होती है। यहां हर और हरि दोनों रूपों में भक्त आराधना करते हैं।
उन्होंने बताया कि गोपाल मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के रूप में विराजे स्वरूपों की सेवा होती है। यहां कान्हा के जन्म के पहले छठी मनाई जाती है और जन्म के छह दिन बाद भी मनाई जाती है, जबकि मथुरा में प्रभु के जन्म के छठवें दिन छठी मनाई जाती है।