स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
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उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में जन्मे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं। जानकारी के मुताबिक, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मूलनाम उमाशंकर है। प्रतापगढ़ में प्राथमिक शिक्षा के बाद वे गुजरात चले गए थे। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य पूज्य ब्रह्मचारी श्री रामचैतन्य जी के सान्निध्य और प्रेरणा से संस्कृत शिक्षा आरंभ हुई।
स्वामी करपात्री जी के अस्वस्थ होने पर वह ब्रह्मचारी रामचैतन्य के साथ काशी चले आए। वहां स्वामी करपात्री जी के ब्रह्मलीन होने तक उन्हीं की सेवा में रहे। वहीं पर इन्हें पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निरंजन-देवतीर्थ और ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का दर्शन एवं सान्निध्य मिला।
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उन्हीं की प्रेरणा से नव्यव्याकरण विषय से काशी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में आचार्य पर्यंत अध्ययन किया। इस दौरान छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के महामंत्री पद पर चुने गए। 15 अप्रैल, 2003 को उमाशंकर को दंड संन्यास की दीक्षा देकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती नाम दे दिया गया। केदारघाट स्थित श्रीविद्यामठ की पूरी कमान संभालते हैं।
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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 2015 में संतों पर लाठी चार्ज के विरोध में अन्याय प्रतिकार यात्रा निकाली थी। इसके पूर्व गंगा सेवा अभियान यात्रा काशी से निकाली। उन्होंने काशी में मंदिर बचाओ आंदोलन निकालकर देश भर के सनातन हिंदुओं को जागृत किया था। ज्ञानवापी में आदि विश्वेश्वर की पूजा के लिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अन्न जल त्याग कर धरना भी दिया था।