काशी के गंगा घाट के किनारे तंग गलियों में आत्मवीरेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ की आत्मा यहीं बसती है, इसलिए इसका नाम आत्मवीरेश्वर महादेव है। काशी के पंचमुद्रा पीठ पर सिंधिया घाट के पास भगवान शिव अग्नि के रूप में विराजमान हैं। भगवान वीरेश्वर के समान सिद्धि और शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का प्रदान करने वाला दूसरा शिवलिंग नहीं है। इसे धरती का सबसे प्राचीन शिवलिंग भी माना जाता है।
सिंधिया घाट पर विराजमान आत्मवीरेश्वर महादेव के मंदिर में आने वाले भक्त संतति की कामना से आते हैं। भगवान आत्मवीरेश्वर महादेव का शृंगार, शाम की सप्तऋषि आरती, शयन आरती काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह ही संपन्न होती है।
स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त और मां भुवनेश्वरी देवी ने पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए आत्मवीरेश्वर मंदिर में अनुष्ठान किया था। एक वर्ष के अनुष्ठान के बाद बाद स्वामी विवेकानंद जैसा ओजस्वी और तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ। स्वामी विवेकानंद का मुंडन संस्कार भी यहीं पर कराया गया था।