काशी के विकास के बहाने हमें आज न जाने क्या क्या सुनने को मिल रहा है। कभी मेट्रो परियोजना तो कभी ‘हृदय’ की डीपीआर, कहीं फ्लाईओवर का जाल तो कहीं फलां-फलां अभियान... एक रंग के शहर में और ना जाने क्या-क्या।
बची-खुची कसर स्मार्ट सिटी की प्लानिंग ने पूरी कर दी है। इंजीनियरिंग की दृष्टि से काशी में ना तो ऐसा विकास संभव है और ना ही उचित।
बनारस को दिल्ली-मुंबई जैसा बनाए जाने की तैयारी चल रही है जबकि ऐसा ना किया जा सकता है और ना ही इसे ऐसा बनाया जाना चाहिए।
शिक्षा, साहित्य और धर्म की इस नगरी को उसके मूल से जुड़े रहने देना चाहिए। ये शहर ईश्वर के साथ भी और ईश्वर को छोड़कर जीने का आदी है।
अपनी 68 साल की अवस्था में आकर जितना इस शहर को जाना है, जीया है, उस अनुभव से रंगकर्मी डॉ. शकुंतला शुक्ला ने ये बातें काशी के संदर्भ में रखीं।
वो कहती हैं कि काशी की सभ्यता यहां के गंगा घाटों से है। काशी की असली पहचान भी गंगा और इसके किनारे बसे इलाके से है लेकिन विकास के नाम पर जो घाटों पर बदलाव किए जा रहे हैं, ये किसी भी तरह से सही नहीं है।
घाटों को सुंदर बनाने के लिए तमाम कवायदें की जा रही हैं लेकिन शहर भर का नाला उस गंगा में गिर रहा है, ये किसी को क्यों नहीं दिख रहा है। गंगा में नाले गिर रहे हैं उसे रोकने के लिए बुद्धि क्यों नहीं लगाई जा रही है।
गंगा पहले से सुंदर है, बस उसे उसके मूल स्वरूप में लाने की जरूरत है। इसके लिए वैज्ञानिक विधि लगाएं। उनका मानना है कि ये गलियों का शहर है। कलाकारों, साहित्यकारों का शहर है। ये पैदल चलने वालों का शहर है।
गोदई महाराज, किशन महाराज, पक्का महाल इन गलियों में कौन सी मेट्रो चलाई जाएगी। शहर में पैदल चलने को जगह कहां हैं? यहां के लोगों को पहले मूलभूत सुविधा दी जाए।
साफ-सफाई, चिकनी सड़कें और गलियां, सड़क पर पैदल चलने के लिए फुटपाथ, पार्क, 24 घंटे बिजली, स्वच्छ पेयजल। इतनी ही सहूलियत देश भर से आने वाले विदेशी पर्यटक भी चाहते हैं।
वो यहां के संगीत और गंगा तट की वजह से ही खिंचे चले आते हैं। उन्हें बस सुधरी हुई यातायात व्यवस्था, अच्छी सड़कें चाहिए। बाकी वो भी गंगा घाट के किनारे उस पुराने स्वरूप को ही देखना, उसे जीना चाहते हैं। इसे किसी अतिरिक्त आधुनिक सुधार की जरूरत नहीं। उसे फिर से पवित्र बनाएं।
डॉ. शकुंतला कहती हैं कि काशी से उनका 68 वर्षों का नाता है। यहीं जन्मीं, यहीं पली बढ़ीं और यहीं शादी हो गई। कभी इस शहर से नाता ही नहीं टूटा और ना कभी टूट सकता है।
बनारस की तंग गलियों के बावजूद यहां की खुली हवा में सांस लिया है मैंने। मुझे इस पर पूरा घमंड है और मैं इस बात को पूरे दिल से कहती हूं कि अगर मैं किसी और शहर में पैदा होती तो मुझे यहां केलोगों से ईर्ष्या होती।
वो कहती हैं कि पहले कबीरचौरा से लेकर हिंदू कॉलेज तक रोजाना पैदल जाना होता था लेकिन कभी थकान महसूस नहीं हुआ करता थी, आज कार से भी जाती हूं तो थकावट आ जाती है।
ये शहर इतने कोलाहल, इतने शोर, इतनी भीड़, इतनी गाड़ियों का बोझ नहीं सह सकता। इसे स्मार्ट बनाकर इस पर और बोझ डालने की तैयारी की जा रही है। इसे मूल रूप में रहने ही नहीं दिया जा रहा है।
यहां फ्लाईओवर, मेट्रो किसी चीज की जरूरत नहीं है। इसे दिल्ली, मुंबई नहीं बनाया जा सकता और ना ही ये शहर वैसा मिजाज रखता है। इस शहर को फैलने-फैलाने की जरूरत नहीं।
यहां दिनों-दिन अस्वच्छता, भीड़ बढ़ रही है। मल्टी स्टोरी बिल्डिंग तो बन रही हैं लेकिन सड़कें वैसी नहीं रह गईं कि वहां आराम से एक कार भी चल पाए। हमारा ध्यान उस पर क्यों नहीं जा रहा है।
काशी पहले काशीवासियों के लिए है, बाद में पर्यटकों के लिए। पहले इस काशी को यहां के लोगों को सुकून देने लायक बनाइएं। उन्हें मूलभूत सुविधाएं दीजिए।
उसके बाद पर्यटकों के लिहाज से काशी को विकसित किया जाए लेकिन उसकी पौराणिकता और मौलिकता को बनाए रखते हुए।