वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के 37वें दीक्षांत समारोह में तीन दशक के बाद महामहोपाध्याय की उपाधि स्वामी शरणानंद महाराज को दी जाएगी। डी लिट की उपाधि विश्व में संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए कार्य करने वाले संस्कृत भारती के संस्थापक पद्मश्री चमूकृष्ण शास्त्री को दी जाएगी। बृहस्पतिवार को विश्वविद्यालय के योग साधना केंद्र में दीक्षांत समारोह के बारे में कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने जानकारी दी।
समारोह में परंपरानुसार मुख्य भवन में कुलपति ने दीक्षांत मंच के समीप भूमि पूजन किया। इस दौरान वैदिक और पौराणिक मंगलाचरण भी हुआ। पूजन के दौरान कुलसचिव, वित्त अधिकारी सहित सभी संकायाध्यक्ष और विभागाध्यक्ष मौजूद थे। अपराह्न में मुख्य भवन में बने दीक्षांत मंडप में दीक्षांत समारोह का पूर्वाभ्यास किया गया। शैक्षिक शिष्टयात्रा निकाली गई।
विश्वविद्यालय की ओर से महामहोपाध्याय की उपाधि 1989 में सात विद्वानों को दी गई थी। इसमें जीवन्यातीर्थ, युधिष्ठिर मीमांसक, पेरि सूर्यनारायण शास्त्री, पं. पीएन पट्टाभिराम शास्त्री, पं. केदार ओझा, एसआर कृष्णमूर्ति शास्त्री, रामचंद्र केशव डोंगरे शामिल हैं।
स्वामी अद्भुत वल्लभ दास को 10, हरिओम शर्मा को 5, राहुल पांडेय को 4, प्रकाश पांडेय को 3, हरेन अस्वार को 3, पन्नू तिवारी को 2, टीका देवी को 2, वीरेंद्र कुमार शुक्ला को 2, सुमन तिवारी को 2, सूर्या प्रसाद पौडेल को 2, अश्विनी कुमार दुबे को 2 स्वर्ण पदक मिलेंगे। जबकि लोकेश शृंगी, अंबुज त्रिवेदी, आलोक शुक्ल, कंचन पांडेय, हिमांशु शेखर त्रिपाठी, रसिक वल्लभ दास, पुष्पा केशरवानी, अच्युत, सुधांशु द्विवेदी, आशीष गडपाल, पत्रिका जैन, बबन कु मार मिश्र, अबिंकेश मिश्र, सतीशचंद्र प्रजापति, अमृतपंथी, श्रद्धा पांडेय, अजय कुमार मौर्य, प्रवीण कुमार मौर्य, प्रांजल कुमार मिश्र, प्रांशु शर्मा, दीनेश्वर धनराज को एक-एक स्वर्ण पदक मिलेंगे।