Varanasi News: विश्व विख्यात संकट मोचन संगीत समारोह में देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। बुजुर्गों की टोलियां भी इसमें शामिल होती हैं। संगीत कार्यक्रम में हर जन भक्ति भाव में लीन हो जाता है। अमर उजाला पर कुछ बुजुर्गों ने बयां किए अपने अनुभव...
'यहां आने पर लगभग 6 हजार का नुकसान हो जाता है, रहने-खाने का 2 हजार और कमाई का 4 हजार। फिर भी हर साल आकर तीन दिन रुकता हूं, क्योंकि यहां से जो ऊर्जा मिलती है उससे साल भर काम में मन लगा रहता है और लाखों रुपये कमाता हूं।' ये कहना है लगातार 25 वर्षों से संकट मोचन संगीत समारोह देखने आ रहे पेशे से दर्जी सासाराम बिहार निवासी काशी प्रसाद खरवार का।
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वे 67 साल के हैं। 1999 के आसपास उनके एक मित्र इस कार्यक्रम में लेकर आए थे। तब से ऐसा मन रमा कि साल के तीन दिन हनुमत भक्ति के लिए फिक्स रखते हैं। हालांकि ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं हैं। बिहार के अलग-अलग गांव से आने वाले उनके मित्रों की टोली लगभग 15 से 20 लोगों की है। कार्यक्रम की अंतिम निशा के अंतिम दौर में भी इन बुजुर्गों की आंखे थकी नहीं हैं। कोई बीएचयू में पढ़ने के दौरान प्रोफेसर के कहने पर यहां आया और कोई किसी दोस्त के आग्रह पर, लेकिन एक बार आ गया तो यहां से हमेशा का जुड़ाव हो गया।
75 वर्षीय लक्ष्मण प्रसाद सिंह बताते हैं कि 1968 में बीएचयू के छात्र थे और तबला सीखते थे। तब अपने अध्यापक पं. लालमणि मिश्रा का सितार वादन देखने आए थे। उस समय पं. लालमणि मिश्रा, किशन महाराज और महंत अमरनाथ एक साथ कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे।
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80 वर्षीय राम बिलास सिंह कहते हैं कि आखिरी प्रस्तुति पं. हरीश तिवारी की है, उसका इंतजार है। 54 साल से इस कार्यक्रम में आ रहे हैं, तब एक दिवसीय कार्यक्रम होता था। आज जिनके बच्चे और शिष्य प्रस्तुतियां दे रहे हैं हमने उन्हें बजाते-सुनाते देखा है। आज महंत विश्वंभर नाथ को प्रस्तुति देते देखा तो उनके दादा महंत अमरनाथ का पखावज बजाने वाला दौर याद आ गया।