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संकट मोचन संगीत समारोह: कलाकारों की पेशकश ने मोहा...लगे हनुमत के जयकारे, बाउंसरों ने किया दुर्व्यवहार

Sun, 12 Apr 2026 04:49 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: संकट मोचन संगीत समारोह के अंतिम दिन हनुमान भक्तों ने मंदिर में हाजिरी लगाई। पूरी रात कलाकारों को सुनते रहे। कलाकारों की मनोहारी प्रस्तुति ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
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संकट मोचन संगीत समारोह में प्रस्तुति देतीं कलाकार। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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Sankat Mochan Sangeet Samaroh: वीकेंड, पर्यटकों और शनिवारीय दर्शनार्थियों की भारी भीड़ के साथ 103वें संकट मोचन संगीत समारोह की अंतिम निशा का समापन हो गया। एक ओर सड़कों तक भक्तों की कतार, तो दूसरी ओर मंच पर संकट मोचन की शास्त्रीय आराधना जारी रही। वहीं महावीर के आंगन में सुनने की श्रद्धा से बैठकी लगाए लोग मंचासीन वादकों और नृत्यांगनाओं से आंखों का संपर्क बनाए रहे। 

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भिंडी बाजार के युवा कलाकार मेहताब के सितार ने दूत के दरबार में प्रभु हरि की प्रशस्ति की। ईशान घोष ने तबले से मेहताब अली नियाजी का बखूबी साथ देकर श्रोताओं को ‘ओम जय जगदीश हरे’ की धुन में रमा दिया। राग में आध्यात्मिकता और लयकारी श्रोताओं को प्रभु से सीधे जोड़ रही थी।

पति-पत्नी ओडिसी में लगे चलती-फिरती मूर्ति: संगीत समारोह की पहली प्रस्तुति ओडिसी नृत्य की रही। रतिकांत महापात्र और सुजाता महापात्र नृत्य के दौरान मंच पर चलती-फिरती मूर्ति जैसे लगे। भुवनेश्वर से आए पति-पत्नी के नृत्य में भगवान जगन्नाथ की छाप साफ दिखी। 

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रामचरितमानस के कथनों को शारीरिक भावों में बिखेरकर प्रस्तुत किया। इसमें उनकी संस्था ‘सृजन’ की नृत्यांगनाओं ने भी संग में नृत्य कर शारीरिक मुद्राओं के संतुलन का बेजोड़ उदाहरण प्रस्तुत किया। अंत में ओडिसी शैली में वाल्मीकि रचित रामायण के दोहों का भी प्रदर्शन किया गया। यह 103वें संगीत समारोह का तीसरा ओडिसी नृत्य रहा।

पद्मभूषण की बेटी ने कबीर के व्यंग्यों को दिया शास्त्रीय सुर: तीसरी प्रस्तुति लेकर संकट मोचन के मंच पर आईं पद्मभूषण कुमार गंधर्व की बेटी, मध्य प्रदेश की कलापिनी कोमकली ने अपनी गायकी में कबीर को याद किया। उनके व्यंग्यों को अपने शास्त्रीय सुरों से श्रोताओं तक पहुंचाया। 

‘सुनता है गुरु ज्ञानी’, ‘गगन में आवाज हो रही झीनी-झीनी’ और ‘कहे कबीर सुनो भई साधो’ को शास्त्रीय सुरों में गाकर श्रोताओं को अपना मुरीद बना लिया। उनकी यह प्रस्तुति बीच-बीच में देशज गीतों की झलक भी देती रही। तबले पर रामेंद्र सिंह सोलंकी, संवादिनी पर धर्मनाथ मिश्र और सारंगी पर विनायक सहाय ने संगत की। 

हनुमानजी की आकृति बनातीं आंचल चाैधरी। - फोटो : संवाद
साहित्य और कला का विकास जन्म से ही होता है
संकट मोचन संगीत समारोह के छठे दिन साहित्य मंच पर ‘साहित्य और कला: एक अंतः संबंध’ विषय पर परिचर्चा हुई। मूर्तिकार प्रो. मदन लाल गुप्त ने कहा कि कला और साहित्य व्याकरण के नियमों से अनुशासित होते हुए भी अपनी चेतना में स्वतंत्र होते हैं। चित्रकार प्रो. संतोष सिंह ने कहा कि मानव सभ्यता के विकास के दौर से ही कला को बढ़ावा देने का बड़ा माध्यम रही है। कालांतर में चित्रों के साथ भावनाएं लिपिबद्ध हुईं। 

कला समीक्षक राजेंद्र शर्मा ने कहा कि साहित्य या अन्य कलाओं का व्यक्ति में विकास जन्म से ही होता है और यही कलाएं व्यक्ति को संवेदनशील बनाती हैं। कलाओं की यही नैसर्गिकता कलाकारों को एक से दूसरी विधा में आवाजाही की इजाजत देती है। प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि साहित्य को कलात्मक होना चाहिए और कला को साहित्यिक। साहित्य और कला दोनों को वर्चस्व का निषेध करना चाहिए, दोनों के बीच आवाजाही के दरवाजे खुले रहने चाहिए। 

संगीत समारोह में पहली बार चली बाउंसरों की मनमर्जी
वाराणसी। संकट मोचन संगीत समारोह में पहली बार हनुमत दरबार में भक्तों को नियंत्रित करने के लिए बाउंसरों की तैनाती की गई। लेकिन बीएचयू की तरह यहां भी उन पर दुर्व्यवस्था के आरोप लगे। कुछ कलाकारों और विशेष लोगों के पास कार्ड होने के बावजूद उनसे गुस्से में पेश आया गया। यहां तक कि मंदिर के पारंपरिक कर्मचारियों को भी अनदेखा कर मनमानी की गई। मंदिर के मुख्य गेट के अलावा बगल के द्वारों से लेकर मंदिर परिसर में घूमते बाउंसरों पर बेवजह लोगों के साथ रोक-टोक करने का आरोप लगा। मंदिर परिसर में शनिवार को भीड़ बढ़ने के चलते ओडिसी नर्तकों को भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। 

2027 में 104वां संगीत समारोह 24-29 अप्रैल तक, उस्ताद मसकूर ने बनाईं बंदिशें
साल 2027 में संकट मोचन संगीत समारोह 24 से 29 अप्रैल तक आयोजित होगा। वहीं मंदिर में अनुष्ठान 21 अप्रैल से ही शुरू हो जाएंगे। इसकी घोषणा मंच संचालनकर्ता सौरभ चक्रवर्ती ने की। इससे पहले पांचवीं निशा की आधी रात के बाद संगीत समारोह की पांच प्रस्तुतियां हुईं। किराना घराना से आए उस्ताद मसकूर अली ने कहा कि अल्लाह के रहम से उन्होंने राम जी, हनुमान जी और बाबा विश्वनाथ पर बंदिशें बनाई हैं। इससे पहले फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए क्लासिकल राग तैयार कर चुकीं विदुषी कंकणा बनर्जी ने राग बागेश्री और ताल झूमरा में डेढ़ घंटे तक शास्त्रीय गायन किया।

संगीत समारोह की पहली महिला कलाकार के तौर पर जानी जाने वाली कंकणा ने तुलसीदास के लिखे ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनिया गाकर श्रोताओं को भगवान राम के बाल्यकाल में लेकर गईं। तबले पर साथ में पंडित समर साहा ने बखूबी थाप दी। मंच पर कंकणा बनर्जी ने राग मालकौंस भी सुनाया। इस दौरान शास्त्रीय संगीत से जुड़े 49 साल के जीवन को याद किया। बताया कि उन्होंने एक बार तानपुरा बजाते-बजाते अचानक सुर लगा दिया था तो पूरे मंदिर परिसर में सवाल उठ गया था।

तबले और सितार से निकला जय-जय राम का स्वर: पांचवीं प्रस्तुति किराना घराने के उस्ताद मसकूर अली खां के गायन और बिलाल खां सोनावा के तबले की रही। गायन की शुरुआत आलाप और राग कौशिक ध्वनि से की। एकताल और तीनताल में दो बंदिशें सुनाने के बाद बहार में तीनताल निबद्ध तराना गाया। डार-डार, पात-पात में लिए गए आलाप और मुर्कियों को श्रोताओं ने खूब सराहा। मोहित साहनी ने संवादिनी पर संगत की। छठवीं प्रस्तुति में काशी के अमरेंद्र मिश्र के सितार वादन की रही। राग कौशिक कान्हड़ा में आलापचारी, तीनताल, एकताल में सितार की धुन निकाली और तबले पर संगत पंडित शुभ महाराज ने की। 
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आप अनुभवी श्रोता, गलती हो जाए तो माफ कर देना - अनिरुद्ध
कोलकाता से आए अनिरुद्ध भट्टाचार्य ने राग ललित में संकट मोचन की संगीत भक्ति कर सातवीं प्रस्तुति दी। तबले पर संगत सुब्रत दंडपत की रही। अनिरुद्ध भट्टाचार्य ने गायन से पहले कहा कि वे पहली दफा मंदिर में आए हैं। आप सभी अनुभवी श्रोता हैं, कोई गलती हो जाए तो क्षमा चाहता हूं। मंच पर दो-दो तानपुरे लेकर आए, इसलिए हाथ जोड़ नहीं पाए। पांचवीं निशा की अंतिम प्रस्तुति उज्जैन के पंडित अभिषेक व्यास ने मकरंद वीणा पर भोर बेला के प्रिय राग अहीर भैरव में प्रस्तुत की। तीनताल में गतकारी कर वादन को विराम दिया। अंशुल प्रताप सिंह ने तबले पर संगत की।
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