नदियों को पाटने, प्रवाह बाधित करने से काशी का पर्यावरण बिगड़ा है। संत सींचेवाल फार्मूले पर काशी की पौराणिक नदियों की मुक्ति का अभियान परवान चढ़ेगा। इस फार्मूले के तहत जन बल के सहयोग से वाराणसी की पहचान से जुड़ी असि नदी को उद्गम से संगम स्थल तक मूल स्वरूप में बहाने की कोशिश की जा रही है।
नदी की तलहटी में अतिक्रमण कर भवन और दुकान खोलने वालों से बातचीत कर उन्हें हटने के लिए राजी किया जाएगा। असि नदी के पुनर्जीवन के अभियान में बाधा डालने वालों से निबटने के लिए प्रशासन का सहयोग लिया जाएगा।
विश्व पर्यावरण दिवस पर सोमवार को यह बातें नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) के राष्ट्रीय सलाहकार और पूर्व डीजी (सिविल डिफेंस) आरएन सिंह ने कहीं। अमर उजाला कार्यालय में बातचीत के दौरान सिंह ने काशी में नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन के जन अभियान को पद्मश्री संत सींचेवाल की प्रेरणा से कामयाब बनाने की अपनी योजना पर विस्तार से चर्चा की।
जल तीर्थों के पर्यावरण प्रेम से सिंह का रिश्ता पुराना है। वाराणसी में डीआईजी (पीएसी) के तौर पर पौराणिक चित्रकूट कुंड, पितृ कुंड, मातृ कुंड, पुष्कर कुंड के अलावा चक्र कुंड की सफाई तो कराई ही थी, कुछ कुंडों, तालाबों को माफिया के कब्जे से मुक्त भी कराया था।
बताया, कुछ महीने पहले काशी की नदियों, कुंडों के पर्यावरणीय संदंर्भों को समझने के लिए संत सींचेवाल को लेकर वह काशी आए थे। 165 किमी लंबी पंजाबी की काली बेन नदी को संत सींचेवाल ने जन सहयोग की बदौलत निर्मल बना दिया। असि नदी सिर्फ 10 किमी ही है।
अभियान में मथुरा के यमुना मिशन के अलावा अन्य संस्थाओं के जुड़ने को उन्होंने सुखद बताया। सिंह कहते हैं कि कारोबारियों, उद्यमियों और पर्यावरण प्रेमियों को अभियान से जोड़ने की कोशिश की जा रही हैं।