शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (बायें)
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शंकराचार्य के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बताया कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सितंबर 1924 को मध्य प्रदेश सिवनी जिले में जबलपुर के समीप दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। गुरुजी ने नौ साल की अवस्था में ही घर छोड़ दिया था। सबसे पहले गाजीपुर की रामपुर पाठशाला और उसके बाद काशी में ही धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज एवं स्वामी महेश्वरानंद से वेद-वेदांग और शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण की।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 19 साल की अवस्था में क्रांतिकारी साधु के रूप में मशहूर हुए और उन्होंने नौ महीने काशी में और छह महीने मध्यप्रदेश की जेल में सजा काटी थी। राम जन्मभूमि के लिए भी उन्होंने राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के तत्वावधान में एक आंदोलन खड़ा किया था। इसके चलते चुनार किले में बनाई गई अस्थायी जेल में उन्हें रखा गया था।
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती
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राम जन्मभूमि के सवाल पर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने श्रीराम जन्मभूमि रामालय न्यास का गठन किया। 30 नवंबर 2006 को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपने अनुयायियों के साथ श्रीराम जन्मभूमि की परिक्रमा की थी। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्यों का कहना है कि आज भी अयोध्या के लोग उस यात्रा का स्मरण करते हैं। अयोध्या के लोग कहते हैं कि यहां इतने लोग आए और शांति बनी रही, ऐसा वह एकमात्र अवसर था।
ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि गुरुजी ने सनातन धर्म, देश और समाज के लिए अतुल्य योगदान किया। स्वतंत्रता सेनानी, रामसेतु रक्षक, गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करवाने वाले तथा रामजन्मभूमि के लिए लंबा संघर्ष करने वाले, गौरक्षा आंदोलन के प्रथम सत्याग्रही, रामराज्य परिषद के प्रथम अध्यक्ष और पाखंडवाद के प्रबल विरोधी थे। उनके जाने से श्रद्धालु, शिष्य व भक्त मर्माहत हैं। यह सनातन जगत की अपूरणीय क्षति है और वह सनातन जगत के सूर्य थे।